वसंत जब सिनेमा ने बोलना सीखा - Worksheets

CBSE Worksheet 01
जब सिनेमा ने बोलना सीखा

  1. सवाक फिल्मों के आने से देह और तकनीक की भाषा की जगह कौन-सी भाषाओँ का फिल्मों में प्रवेश हुआ?
  2. आलमआरा फिल्म ने किस भाषा को लोकप्रिय बनाया? (जब सिनेमा ने बोलना सीखा)
  3. 'स्टंटमैन' व 'फैटेसी' शब्दों से आप क्या समझते हैं? (जब सिनेमा ने बोलना सीखा)
  4. भारत की पहली सवाक् फ़िल्म कौन-सी थी? इस फ़िल्म के निर्माता कौन थे?
  5. जब भारत की पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।
  6. ‘मूक सिनेमा’ से आप क्या समझते हैं ? इसकी लोकप्रियता में कमी क्यों आने लगी?
  7. दर्शकों हेतु यह फिल्म का अनोखा अनुभव कैसे थी? (वसंत जब सिनेमा ने बोलना सीखा)
  8. निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
    सवाक् फिल्मों के लिए पौराणिक कथाओं, पारसी रंगमंच के नाटकों, अरबी प्रेम-कथाओं को विषय के रूप में चुना गया। इनके अलावा कई सामाजिक विषयों वाली फिल्में भी बनीं। ऐसी ही एक फिल्म थी-'खुदा की शान।' इसमें एक किरदार महात्मा गांधी जैसा था। इसके कारण सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना करना पड़ा।
    1. सवाक् फिल्मों के विषय क्या चुने गए?
    2. "किरदार' शब्द से आप क्या समझते हैं?
    3. सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना क्यों करना पड़ा?
    4. ब्रिटिश शासक क्या चाहते थे?
    5. 'खुदा की शान' फिल्म में किस किरदार की छाप थी?
CBSE Worksheet 01
जब सिनेमा ने बोलना सीखा

Solution
  1. सवाक फिल्मों के आने से देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का प्रवेश हुआ।
  2. आलमआरा ने हिंदी-उर्दू के मेल वाली हिंदुस्तानी भाषा को लोकप्रिय बनाया।
  3. स्टंटमैन का अर्थ है करतब दिखाने वाला व फैंटेसी का अर्थ है मौज-मस्ती।
  4. भारत की पहली सवाक् फ़िल्म ‘आलम आरा’ थी। इस फ़िल्म के निर्माता अर्देशिर एम० ईरानी थे, जिन्होंने चार माह से अधिक समय की कड़ी मेहनत से यह फ़िल्म तैयार की।
  5. जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर लिखा था-'वे सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए; उनको बोलते; बातें करते देखो।'
    'अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए' यह पंक्ति दर्शाती है कि फिल्म में अठहत्तर चेहरे थे अर्थात् फिल्म में अठहत्तर लोग काम कर रहे थे।
  6. ‘मूक सिनेमा’ वे फ़िल्में होती थीं जिनमें कलाकार अभिनय करते थे। उनकी उछल-कूद, कलाबाजियाँ आदि हम देखते थे किंतु उनकी हँसी एवं संवाद नहीं सुन पाते थे। इसे ही ‘मूक सिनेमा’ कहते हैं। लोगों की सवाक् सिनेमा में रूचि बढ़ी और इसकी लोकप्रियता में कमी आती गई।
  7. 'आलम आरा' पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें नायक-नायिकाओं ने स्वयं बोलकर विचारों को प्रस्तुत किया। यह लोगों के लिए अनोखा अनुभव थी। इस फिल्म में गीत-संगीत एवं नृत्य का अद्वितीय संयोजन था। यह एक मौज-मस्ती वाली फिल्म थी। मशहूर अभिनेत्री जुबेदा और अभिनेता बिट्ठल ने इसमें काम किया था। लोगों ने इस फिल्म को अत्यधिक पसंद किया। यही कारण था कि आठ सप्ताह तक हाउसफुल चला और फिर बाद में दूसरे देशों श्रीलंका, बर्मा और पश्चिम एशिया में भी चर्चित रही।
    1. सवाक् फिल्मों के विषय पौराणिक कथाएँ, पारसी रंगमंच के नाटक, अरबी प्रेम कथाएँ एवं सामाजिक विषय चुने गए।
    2. सवाक् सिनेमा को ब्रिटिश प्रशासकों की तीखी नज़र का सामना करना पड़ता था क्योंकि अंग्रेजी सरकार नहीं चाहती थी कि उसकी किसी भी कार्यविधि की झलक फिल्मों में दिखाई दे जिससे लोग उनके विरूद्ध हो।
    3. 'किरदार' शब्द का अर्थ है-किसी विशेष की भूमिका निभानी।
    4. उनकी कार्यविधि का अंश भी सिनेमा में छाप न रखे।
    5. महात्मा गाँधी।