जन-आंदोलनों का उदय - पुनरावृति नोट्स
CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
पुनरावृति नोटस
भाग-2 पाठ-7
जन-आंदोलनों का उदय
पुनरावृति नोटस
भाग-2 पाठ-7
जन-आंदोलनों का उदय
स्मरणीय बिंदु-
- जो आंदोलन किसी राजनीतिक दल के सहयोग द्वारा शुरू किये जाते हैं उन्हें दल आधारित आंदोलन कहते हैं। जैसे आंध्र प्रदेश में किसानों द्वारा तेलंगाना आंदोलन (कम्यूनिस्ट पार्टी) तिभागा आंदोलन, नक्सलवादी आंदोलन।
- जो आंदोलन स्वयंसेवी संगठनों, स्थानीय लोगों, छात्रों द्वारा किसी समस्या से पीड़ित होने के कारण शुरू किये जाते हैं, उन्हें राजनैतिक दलों से स्वतंत्र जन आंदोलन कहते हैं। जैसे - दलित पैंथर्स, ताड़ी विरोधी आंदोलन
- सरकार द्वारा व्यावसायिक कटाई की अनुमति के विरोध में प्रदर्शन अर्थात् चिपको आंदोलन दुनिया का प्रसिद्ध पर्यावरणीय आन्दोलन हो गया, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल थे। वन विभाग ने गाँव वालों को खेती-बाड़ी के औजार बनाने के लिए अंगू के पेड़ काटने की अनुमति देने से इनकार कर दिया और यह जमीन खेल-सामग्री के एक विनिर्माता को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए आबंटित कर दिया। इस आंदोलन का एकदम नया पहलू यह था कि इसमें सामाजिक मसलों के साथ महिलाओं की सक्रिय भागीदारी थी।
- सरकार के इस रवैये से असंतुष्ट होकर लोग एकजुट हुए और अपनी माँगें पूरी करने के लिए आवाज उठाई। ये आंदोलन दलीय तथा गैरदलीय प्रणाली पर आधारित थे। दलीय प्रणाली आधारित आदोलन राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए जाते हैं (कोलकाता, कानपुर और बॉम्बे आदि के ट्रेड यूनियन आन्दोलन) और गैरदलीय आन्दोलन वर्तमान लोकतांत्रिक संस्थाओं या चुनावी राजनीति में विश्वास खोने पर आधारित होते हैं (विभिन्न वर्गों से छात्रों व युवाओं का सम्मेलन होना)
- गैरदलीय आन्दोलन समाज के विभिन्न वर्गों के बीच असंतुष्टि की वजह से पैदा हुए, जैसे-जनता-प्रयोग का फेल होना, शहरी व ग्रामीण औद्योगिक क्षेत्रों के बीच खाई का पनपना, राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक असमानता व अन्याय का अस्तित्व में होना।
- दलित हितों की दावेदारी के इसी क्रम में महाराष्ट्र में 1972 में दलित युवाओं का एक संगठन दलित पैथर्स बना। दलित पैथर्स ने जाति आधारित असमानताओं जैसे मसलों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी और आरक्षण कानूनों के कारगर क्रियान्वयन और सामाजिक न्याय की ऐसी ही नीतियों का कारगर क्रियान्वयन इनकी प्रमुख माँग थी।
- भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के क्रियान्वयन के खिलाफ़ भारतीय किसान यूनियन कृषि-संघर्ष के रूप में अग्रणी कृषक आन्दोलन था। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ के सरकारी खरीद-मूल्य में बढ़ोतरी करने, कृषि उत्पादों के अंतर्राज्यीय आवाजावी पर लगी पाबंदियाँ हटाने, समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने तथा किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की माँग की।
- ताड़ी विरोधी आन्दोलन मदिरा के खिलाफ़ आंध्र प्रदेश राज्य की महिलाओं द्वारा शुरू किया गया था। यह लड़ाई सरकार और माफिया दोनों के खिलाफ़ थी तथा अपने आस-पड़ोस में मदिरा की ब्रिक्री पर पाबंदी की माँग कर रही थी। इस आन्दोलन ने खुले तौर पर घरेलू हिंसा के मसलों पर बोलने का मौका दिया, जैसे-दहेज, यौन उत्पीड़न आदि।
- नर्मदा नदी के बचाव में नर्मदा बचाओ आन्दोलन चला। इसने नर्मदा सागर योजना के रूप में बनने वाली बहुद्देशीय बाँधों के निर्माण का विरोध किया, जिसने विकास की बहुत सारी योजनाओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। नर्मदा बचाओं आन्दोलन विस्थापितों को समर्पित करने की माँग से लेकर बाँध के पूर्णतया विरोध के रूप में परिवर्तित हो गया था। सरकार द्वारा 2003 में स्वीकृत राष्ट्रीय पुनर्वास नीति को नर्मदा बचाओ जैसे सामाजिक आन्दोलन की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।
- आंदोलन का मतलब सिर्फ धरना-प्रदर्शन या सामूहिक कार्रवाई नहीं होता। इसके अंर्तगत किसी समस्या से पीड़ित लोगों का धीरे-धीरे एकजुट होना और समान अपेक्षाओं के साथ एक-सी माँग उठाना जरूरी है। इसके अतिरिक्त आदोलन का एक काम लोगों को अपने अधिकारों को लेकर जागरूक बनाना भी है, ताकि लोग यह समझे कि लोकतंत्र की संस्थाओं से वे क्या-क्या उम्मीद कर सकते हैं। ऐसे में इन आदोलनों ने लोकतंत्र को बाधा नहीं पहुँचाई, बल्कि उसका विस्तार ही किया।
- सूचना के अधिकार का आंदोलन 1990 में शुरू हुआ, जब मजदूर किसान शक्ति संगठन (एम०के०एस०एस०) ने सरकार के सामने माँग रखी कि अकाल राहत कार्य और मजदूरों को दी जाने वाली पगार के रिकॉर्ड का सार्वजनिक खुलासा किया जाए। बाद में यह अधिकार सदन में रखा गया और 2005 में एक कानून बन गया।
चिपकी आंदोलन- (पर्यावरण आंदोलन)-
- 1973 में उत्तराखण्ड में शुरू
- वन विभाग ने खेती बाड़ी के औजार बनाने के लिये पेड़ो (अंगू) की कटाई से इंकार किया।
- जबकि खेल-सामग्री के विनिमांता को व्यवसायिक इस्तेमाल के लिये जमीन का आबटन।
- महिलाओं व समस्त ग्रामवासियों द्वारा पेड़ो की कटाई का विरोध।
- महिलायें पेड़ों की कटाई के विरोध में पेड़ों से चिपक गयी।
माँगे - स्थानीय लोगों का जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कारगर नियंत्रण।
- सरकार लघु उद्योगों के लिये कम कीमत पर सामग्री उपलब्ध कराये।
- क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को नुकसान पहुँचाये बिना विकास सुनिश्चित करे।
- महिलाओं ने शराबखोरी की लत के खिलाफ भी आवाज उठायी।
परिणाम:-
- सरकार ने 15 सालो के लिये हिमालयी क्षेत्र में पेड़ो की कटाई पर रोक लगा दी।
प्रमुख नेता :- सुन्दरलाल बहुगुणा-
- बाद के वर्षों में देश के विभिन्न भागों में उठे जन आंदोलन का प्रतीक।
- महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
दलित पैन्थस:-
- यह आंदोलन जाति आधारित असमानता के खिलाफ झुग्गी-बस्तियों के युवाओं द्वारा महाराष्ट्र में चलाया गया। यहाँ 1972 में दलित युवाओं ने ‘दलित पैंथर्स’ नाम से संगठन बनाया। इसका उद्देश्श्य जाति आधारित सामाजिक अन्याय का विरोध एवं आरक्षण और सामाजिक न्याय की नीतियों के कारगर क्रियान्वयन की माँग उठाना था। दलित पैंथर्स का बृहत्तर विचारधारात्मक एजेंडा जाति प्रथा को समाप्त करना तथा भूमिहीन गरीब किसान, शहरी औद्योगिक मजदूर और दलित सहित सारे वंचित वर्गो का एक संगठन खड़ा करना था।
- दलित समुदाय की पीड़ा व आक्रोश की अभिव्यक्ति महाराष्ट्र में 1972 में शिक्षित दलित युवाओं ने ‘दलित पैन्थस' नामक संगठन बना कर की।
माँगे:-
- जाति आधारित असमानता तथा भौतिक संसाधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ना।
- आरक्षण के कानून व सामाजिक न्याय की नीतियों के कारगर क्रियान्वयन की माँग।
- दलित महिलाओं के साथ हो रहे दुव्यवहार का विरोध।
- भूमिहीन किसानो, मजदूरों व सारे वंचित वर्ग को उनके अधिकार दिलवाना।
- दलितों में शिक्षा का प्रसार
दलित पैंथस की गतिविधियाँ:-
- अनेको साहित्यिक रचनायें लिखी। रचनात्मक व सृजनात्मक ढंग से अपनी लड़ाई लड़ी।
- दलित युवकों ने आगे बढ़कर अत्याचारों का विरोध किया।
परिणाम:-
- सरकार ने 1989 में कानून बनाकर दलितों पर अत्याचार करने वालों के लिये कठोर दण्ड का प्रावधान किया।
- दलित पैन्थस के राजनीतिक पतन के बाद बामसेफ (Backward and Minority Classes Employees Federation BAMCEF) का निर्माण।
भारतीय किसान यूनियम (BKU):-
- 1988 के जनवरी में उत्तर प्रदेश के मेरठ में BKU के सदस्य किसानों ने धरना दिया। (महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में)
- यह आंदोलन हरित क्रांति से लाभान्वित अपेक्षाकृत धनी किसानों का आंदोलन था। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ के सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोत्तरी करने कृषि उत्पादों के अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगी पाबंदिया हटाने, समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने, किसानों के कर्ज माफ करने तथा उन्हें पेंशन का प्रावधान करने की मांग की। इस आंदोलन में रैली, धरना, प्रदर्शन और जले भरों अभियान जैसे तरीके अपनाये गये। यह आंदोलन अपनी राजनीतिक मोल भाव की क्षमता के चलते अस्सी के दशक का सबसे सफल आंदोलन सिद्ध हुआ।
माँगें-
- बिजली की दर में की गयी बढ़ोतरी का विरोध
- गन्ने व गेहूँ के सरकारी मूल्यों में बढ़ोतरी की माँग
- कृषि उत्पादों के अन्तर्राजयीय व्यापार पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की माँग।
- निर्बाध विद्युत आपूर्ति की सुनिश्चितता।
- किसानों के लिये पेंशन का प्रावधान।
- किसानों के बकाया कज माफ
कार्यवाही / शैली । गतिविधियाँ
- धरना, रैली, प्रदर्शन, जेल भरो आदि कार्यवाहियों से सरकार पर दबाब बनाया।
विशेषताएँ
- BKU ने किसानों की लामबंदी के लिये जातिगत जुड़ाव का इस्तेमाल किया।
- अपनी संख्या के दम पर राजनीति में एक दबाब समूह की भांति सक्रिय।
- आंदोलन की सफलता के पीछे इसके सदस्यों की राजनीति, मोलभाव की क्षमता थी क्योंकि ये नकदी फसल उपजाते थे।
- अपने क्षेत्र की चुनावी राजनीति में इसके सदस्यों का रसूख था। महाराष्ट्र का शेतकारी संगठन व कनाटक का रैयतकारी संगठन किसान संगठनों के जीवन्त उदाहरण हैं।
ताड़ी-विरोधी आंदोलन:-
- यह आंदोलन आंध्र प्रदेश की महिलाओं का एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन था। यह शराब माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ चला। ये महिलाएं अपने आस-पड़ोस में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही थी। नेल्लोर जिले से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे फैलता चला गया। इस आंदोलन ने महिलाओं के मुद्दो के प्रति समाज में जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
- शराब विरोधी आंदोलन की शुरूआत आंध्रप्रदेश के नैल्लौर जिले के दुबरगंटा गाँव में हुआ।
- लगभग 5000 गाँवों की महिलाओं ने आंदोलन में भाग लिया।
- नैल्लौर जिले में ताड़ी की बिक्री की नीलामी 17 बार रद्द हुई।
- 'ताड़ी की बिक्री बंद करो’ का नारा लगाया।
माँगे-
- शराब की वजह से स्वास्थ्य खराब हो गया था, आर्थिक कठिनाई हो रही थी
- अतः ताड़ी की बिक्री का विरोध- घरेलू हिंसा, महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, तथा लैंगिक भेदभाव का विरोध।
- दहेज प्रथा का विरोध
परिणाम-
- कई राज्यों में शराबबंदी लागू
- घरेलू हिंसा व महिला अत्याचारों के विरूद्र कठोर नियम।
- महिलाओं की माँग पर स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू। (73वें तथा 74वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा)
नेशनल फिशवकस फोरम (NFF)-
- मछुआरों की संख्या के लिहाज से भारत का विश्व में दूसरा स्थान।
- सरकार द्वारा बॉटम ट्राऊलिंग (व्यवसायिक जहाजों को गहरे समुद्र में मछली मारने की इजाजत) से मछुआरों की आजीविका पर प्रश्न चिन्ह
- बाध्य होकर मछुआरों में NFF बनाया।
- 2002 में NFF द्वारा विदेशी कपनियों की मछली मारने का लाइसेंस जारी करने के विरोध में राष्ट्र व्यापी हड़ताल की गयी।
- पारिस्थितिकी की रक्षा व मछुआरों के जीवन को बचाने के लिये अनेक कानूनी लड़ाईयाँ लड़ी।
- विश्व के समधर्मा संगठनों से हाथ मिलाया।
नर्मदा बचाओं आंदोलन:-
- नर्मदा बचाओ आंदोलन नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर सरदार सरोवर परियोजना के तहत बनने वाले बाँधें का विरोध करता है। यह आंदोलन विकास के मॉडल और उसके सार्वजनिक औचित्य पर सवाल उठाता रहा है। इस आंदोलन ने बहु-उद्देशीय विकास परियोजनाओं के स्थानीय लोगों के आवास, आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को प्रभावी ढंग से उजागर किया है। यह आंदोलन ऐसी परियोजनाओं की निर्णय प्रक्रिया और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के नियंत्रण जैसे मुद्दे भी उठाता रहा है।
- नर्मदा घाटी विकास परियोजना में मध्य प्रदेश, गुजरात, व महाराष्ट्र से गुजरने वाली नर्मदा व सहायक नदियों पर 30 बड़े, 135 मझोले तथा 300 छोटे बाँध बनाने का प्रस्ताव।
लाभ-
- गुजरात के बहुत बड़े हिस्से सहित तीनों राज्यों में पीने के पानी, सिंचाई तथा बिजली उत्पादन की सुविधा।
- कृषि की उपज में गुणात्मक सुधार।
- बाढ़ व सूखे की आपदाओं पर अंकुश।
विरोध-
- इन परियोजनाओं का लोगों के पर्यावास, आजीविका, संस्कृति तथा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव।
- परियोजना के कारण हजारों लोग बेघर (245 गाँव के डूब के क्षेत्र में आने है। 2.5 लाख लोग बेघर)
माँगे-
- परियोजना से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित सभी लोगों का समुचित पुर्नवास।
- परियोजना की निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी।
- जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्रभावी नियन्त्रण।
- बाँधों के निर्माण में आ रही भारी लागत का सामाजिक नुकसान के संदर्भ में मूल्यांकन किया जाये।
आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता/व्यक्ति
मेधा पाटेकर, आमिर खान
मेधा पाटेकर, आमिर खान
परिणाम-
- इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप केन्द्र सरकार ने 2003 में राष्ट्रीय पुर्नस्थापन नीति की घोषणा की।
सूचना का अधिकार (RTI)
- आंदोलन की शुरूआत 1990 में MKSS (मजदूर किसान शक्ति संगठन) ने की (राजस्थान के दौसा जिले की भीम तहसील में)
- ग्रामीणों ने प्रशासन से अपने वेतन व भुगतान के बिल उपलब्ध कराने को कहा।
- उन्हें दी गयी मजदूरी में हेरा फेरी हुई थी।
- आंदोलन के दबाव में राजस्थान सरकार ने कानून बनाया कि जनता को पंचायत के दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने की अनुमति है।
- पंचायतों के लिये बजट, लेखा, खर्च, नीतियों व लाभार्थियो के बारे में सार्वजनिक घोषणा करना अनिवार्य।
- 1996 में MKSS ने दिल्ली में सूचना के अधिकार को लेकर राष्ट्रीय समिति का गठन किया।
- 2004 में सूचना के अधिकार के विधेयक को सदन में रखा गया।
- जून 2005 में विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
मडल आयोग की रिपोर्ट का क्रियान्वयन व उसके परिणाम
मण्डल आयोग का गठन बी.पी. मण्डल (बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल) की अध्यक्षता में 1979 में किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय समाज के विभिन्न तबको के बीच शैक्षिक तथा सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना था। आयोग ने 1980 को अपनी सिफारिशीं दी।
मण्डल आयोग का गठन बी.पी. मण्डल (बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल) की अध्यक्षता में 1979 में किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय समाज के विभिन्न तबको के बीच शैक्षिक तथा सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना था। आयोग ने 1980 को अपनी सिफारिशीं दी।
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को केन्द्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण।
- शिक्षण संस्थानों में आरक्षण
- पिछड़ापन वर्ग की स्थिति सुधारने के लिये भूमि सुधार।
क्रियान्वयन का परिणाम
- आरक्षण के विरोध में उत्तर भारत के शहरों में व्यापक हिंसक प्रर्दशन हुए। इसमें छात्रों द्वारा हड़ताल, धरना, प्रर्दशन, सरकारी संपत्ति को नुकसान आदि शामिल थे। परन्तु इस विरोध का सबसे अहम पहलू बेरोज़गार युवाओं व छात्रों द्वारा आत्मदाह तथा आत्महत्या जैसी घटनायें थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी द्वारा सरकार के फैसले के खिलाफ सर्वप्रथम आत्मदाह का प्रयास किया गया। विरोधियों का तक था कि जातिगत आधार पर आरक्षण समानता के अधिकार के खिलाफ है। तमाम विरोधों के बावजूद 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा ये सिफारिशें लागू कर दी गयी।
जन आंदोलन-
- 1970 के दशक में विभिन्न सामाजिक वर्गो, जैसे-महिला, छात्रा, दलित और किसानों को लग रहा था कि लोकतांत्रिक राजनीति उनकी जरूरत और माँगों पर ध्यान नहीं दे रही है। इसके चलते भारतीय राजनीति में जन आंदोलनों में विभिन्न तरीकों से जनता की भावनाओं को व्यक्त किया गया। इससे सरकार और देश का ध्यान अनछुए मुद्दो की ओर गया तथा इस दिशा में कदम उठाए गए। स्मरणीय है कि ऐसे आंदोलनों में प्रमुख राजनीतिक दलों का योगदान नगण्य था।
प्रमुख जन आंदोलन:-
- चिपको आंदोलन:- चिपको आंदोलन उत्तराखंड के कुछ गाँवों से शुरू हुआ। वन विभाग ने स्थानीय लोगों को पेड़ काटने की अनुमति देने से मना कर जब खेल सामग्री बनाने वाली कम्पनी को अनुमति दे दी। इससे स्थानीय लोगों में फैला रोष इस आंदोलन के रूप में सामने आया। इस आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही। महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें काटने का विरोध किया। यह विरोध बड़ी जल्दी अन्य इलाकों में भी फैल गया। इसमें कुछ और सामाजिक मसले भी जुड़ गये। आखिरकार इस आंदोलन को सफलता मिली और सरकार को झुकना पड़ा।
जन आंदोलन के सबक:-
- देश में उठने वाले जन आंदोलन देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। इन आंदोलनों ने ऐसी समस्याओं को उठाया है जिनको उठाने में राजनीतिक दलों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इस प्रकार जन आंदोलनों ने समाज के गहरे तनावों और जनता के क्षोभ को एक सार्थक दिशा देकर एक तरह से लोकतंत्र की रक्षा की है।
- इन आंदोलनों का उद्देश्य दलीय राजनीति की खामियो को दूर करना। सामाजिक आंदोलनों ने समाज के उन नये वगों की सामाजिक आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी जो अपनी समस्याओं को चुनावी राजनीति के जरिये हल नहीं कर पा रहे थे। जनता के क्षोभ व समाज के गहरे तनावों की सार्थक दिशा दे कर लोकतंत्र की रक्षा की। सक्रिय भागीदारी के नये प्रयोग ने लोकतंत्र के जनाधार को बढ़ाया। जनता की जागरूक किया तथा लोकतांत्रिक राजनीति को बेहतर ढंग से समझने में मदद।
निष्कर्ष:-
- ये आंदोलन लोकतंत्र के लिये खतरा नहीं होते, बल्कि लोगों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास जागृत करते है। इनका उद्देश्य दलीय राजनीति की खामियों को दूर करना होता है। अतः इन्हें समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिये।