न्यायपालिका - पुनरावृति नोट्स
CBSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान
पाठ - 6 न्यायपालिका
पुनरावृति नोटस
पाठ - 6 न्यायपालिका
पुनरावृति नोटस
स्मरणीय बिन्दु-
- न्यायपालिका सरकार का महत्वपूर्ण तीसरा अंग है जिसे विभिन्न व्यक्तियों या निजी संस्थाओं ने आपसी विवादों को हल करने वाले पंच के रूप में देखा जाता है कि कानून के शासन की रक्षा और कानून की सर्वोच्चता को सुनिश्चित दबाव से मुक्त होकर स्वतंत्र निर्णय ले सकें | न्यायपालिका देश के संविधान लोकतान्त्रिक परम्परा और जनता के प्रति जवाबदेह है |
- न्यायपालिका देश की लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना का एक हिस्सा है। न्यायपालिका देश के संविधान, लोकतांत्रिक परंपरा और जनता को प्रति जवाब देह है।
- कानून के शासन’ का भाव कानून के समक्ष सभी समान है।
- न्यायपालिका भी स्वतंत्रता न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो।
- विधायिका और कार्यपालिका न्यायपालिका के कार्यो में किसी प्रकार की बाधा न पहुचाएं ताकि कार्यो में वह ठीक ढ़ग से न्याय कर सके।
- न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना कार्य कर सके।
- न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए किसी व्यक्ति को वकालत का अनुभव या कानून का विशेषज्ञ होना चाहिए। इनका निश्चित कार्यकाल होता है। वे सेवा निवृत्त होने तक पद पर बने रहते है। विशेष स्थितियों में न्यायधीशों को हटाया जा सकता है।
- न्यायपालिका, विधायिका या कार्यपालिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है।
न्यायधीशों की नियुक्ति:-
- मंत्रिमंडल, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और भारत के मुख्य न्यायधीश- ये सभी न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया को प्रभावित करते है।
- मुख्य न्यायधीश की न्युक्ति के सन्दर्भ में यह परम्परा भी है कि सर्वोच्च न्यायलय के सबसे वरिष्ठ न्यायधीश को मुख्य्न्ययधीश चुना जाता है किंतु भारत में इस परम्परा को दो बार तोड़ा भी गया है |
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करता है। ताकि न्यायलय की स्वतंत्रता व शक्ति संतुलन दोनों बने रहे |
भारतीय न्यायपालिका की संरचना
- सर्वोच्च न्यायालय
- उच्च न्यायालय
- जिला न्यायालय
- अधीनस्थ न्यायालय\
सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्रधिकार:-
- मौलिक क्षेत्रधिकार: केंद्र व राज्यों के बीच विवादों का निपटारा
- रिट संबंधी क्षेत्रधिकार: मौलिक अधिकारों का संरक्षण
- अपीलीय क्षेत्रधिकार: दीवानी फौजदारी व संवैधानिक सवालों से जुड़े अधीनस्थ न्यायलयों के मुकदमों पर अपील सुनना |
- सलाह संबंधी क्षेत्रधिकार: जनहित के मामलों तथा कानून के मसलों पर राष्ट्रपति को सलाह देना |
न्यायिक सक्रियता:- भारत में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका रही है।
विशेषाधिकार
- किसी भारतीय अदालत के दिये गये फैसले पर स्पेशल लाइव पिटीशन के तहत अपील पर सुनवाई |
- भारत में न्यायिक का मुख्य साधन जन हित याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका या सामाजिक व्यवहार याचिका रही है |
- 1979-80 के बाद जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामले में रूचि दिखाई जहाँ समाज के कुछ वर्गो के लोग आसानी से अदालत की कुछ वर्गो के लोग आसानी से अदालत की शरण नही ले सके। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु न्यायालय ने जन सेवा की भावना से भरे नागरिक, सामाजिक संगठन और वकीलों को समाज के जरूरतमंद और गरीब लोगों की ओर से याचिकाएं दायर करने की इजाजत दी।
- न्यायिक सक्रियता ने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया और कार्यपालिका उत्तरदायी बनने पर बाध्य हुई।
- चुनाव प्रणाली को भी ज्यादा मुक्त और निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया।
- चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति आय और शैक्षणिक योग्यताओं के संबंध में शपथ पत्र देने का निर्देश दिया, ताकि लोग सही जानकारी के आधार पर प्रतिनिधियाें का चुनाव कर सके।
सक्रिय न्यायपालिका का नकारात्मक पहलू:-
- न्यायपालिका में काम का बोझ बढ़ा।
- न्यायपालिका सक्रियता से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यो के बीच अन्तर करना मुश्किल हो गया है जैसे - वायु और ध्वनि प्रदूषण दूर करना, भ्रष्टाचार की जांच व चुनाव सुधार करना इत्यादि विधायिका की देखरेख में प्रशासन और करने चाहिए।
- सरकार का प्रत्येक अंश एक-दूसरे की शक्तियों और क्षेत्रधिकार का सम्मान करें।
न्यायपालिका और अधिकार
- न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून की संवैधानिकता जांच सकता है यदि व संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो तो उसे गैर-संवैधानिक घोषित कर सकता है।
- संघीय संबंधो (केन्द्र-राज्य संबंध) के मामले में भी सर्वोच्च न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
- न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित कानूनों की और संविधान की व्याख्या करती है। प्रभावशाली ढंग संविधान की रक्षा करती है।
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है।
- जनहित याचिकाओं द्वारा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा ने न्यायपालिका की शक्ति में बढ़ोत्तरी की है।
न्यायपालिका और संसद:-
- भारतीय संविधान में सरकार के प्रत्येक अंग का एक स्पष्ट कार्य क्षेत्र है। इस कार्य विभाजन के बावजूद संसद और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका और न्याय पालिका के बीच टकराव भारतीय राजनीति की विशेषता रही है।
- संपत्ति के अधिकार
- संसद की संविधान को संशोधित करने की शक्ति के संबंध में।
- इनके द्वारा मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
- निवारक नजरबन्दी कानून
- नौकरियों में आरक्षण संबंधी कानून
1973 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
- संविधान का एक मूल ढ़ाँचा और संसद सहित कोई भी उस मूल ढ़ांचे से छेड़-छाड़ नहीं कर सकती। संविधान संशोधन द्वारा भी इस मूल ढांचे को नही बदला जा सकता।
- संपत्ति के अधिकार के विषय में न्यायालय ने कहा कि वह मूल ढांचे का हिस्सा नही है उस पर समुचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
- न्यायालय ने यह निर्णय अपने पास रखा कि कोई मुद्दा मूल ढांचे का हिस्सा है या नहीं यह निर्णय संविधान की व्याख्या करने की शक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है।
- लोकतंत्र में सरकार के एक अंग का दूसरे अंग की सत्ता के प्रति सम्मान करना बहुत जरूरी है।
- संसद व न्यायपालिका के बीच विवाद के विषय बने रहते है | संविधान यह व्यवस्था करना है कि न्यायधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती लेकिन कर्र अवसरों पर न्यायपालिका के आचरण पर उंगली उठाई गई है | इसी प्रकार न्यायपालिका ने भी कई अवसरों पर विधायिका की आलोचना की है |