भारत के विदेश सम्बन्ध - पुनरावृति नोट्स

CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
पुनरावृति नोटस
भाग-2 पाठ-4
भारत के विदेश संबंध

स्मरणीय बिन्दु-
शीत युद्ध के दौरान भारत स्वतंत्र हुआ इसी दौरान एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका में अनेक देश स्वतंत्र हुए इनमे से कुछ देशो ने दोनो गुटों से दूर रहने का निर्णय लिया। 1955 में एक्रो एशियाई देशों की एकता का एक सम्मेलन बाडुंग-इण्डोनेशिया में हुआ। यहीं पर गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नींव पड़ी। गुट निरपेक्ष आन्दोलन का पहला शिखर सम्मेलन सितम्बर 1961 में बेलग्रेड-यूगोस्लाविया में हुआ।
इसके निर्माण में निम्न नेताओं का मुख्य योगदान रहा-
  1. जवाहरलाल नेहरू - भारत
  2. गमाल अब्दुल नासिर - मिश्र
  3. मार्शल जोज्फ ब्रांज टीटो - यूगोस्लविया
  4. वामे एनक्रुमा - घाना
  5. सुकार्णो - इण्डोनेशिया
गुट निरपेक्षता की नीति के उद्देश्य (सिद्धांत):-
  1. किसी गुट में शामिल न होना
  2. स्वतंत्र विदेशी नीति
  3. विश्व शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा
  4. साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोध
  5. नस्ल व रंगभेद का विरोध
  6. निशस्त्रीकरण को बढ़ावा
  7. पर्यावरण संरक्षण व मानवाधिकार लागू।
भारत की विदेशी नीति के सिद्धांत:-
  1. गुट निरपेक्षता
  2. शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व
  3. पंचशील
  4. साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोध
  5. यूएनओ का समर्थन
  6. बिना शर्त विदेशी सहायता प्राप्त
  7. क्षेत्रीय सहयोग
  8. निशस्त्रीकरण
  9. विश्व शान्ति।
भारत चीन शान्ति व संघर्ष:-
  1. पंचशील - 29 अप्रैल 1954 को भारत के नेहरू व चीन के चाऊ एन. लाई ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये।
    1. परस्पर अखण्डता व प्रभुसत्ता का सम्मान
    2. परस्पर लाभ व समानता
    3. अनाक्रमण
    4. अहस्ताक्षेप
    5. शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व
  2. तिब्बत: - 1958 में चीन के विरुद्ध विद्रोह, 1959 में दलाई लामा को भारत ने शरण दी, भारत चीन कटुतापूर्ण सम्बन्ध।
  3. 1962 में सीमा विवाद के कारण दोनो देशो में युद्ध हुआ। युद्ध के कारण भारतीय साम्यवादी दल (सीपीआई) 1964 में दो गुटो में विभाजित हुआ जिसमें एक गुट जिसने युद्ध में चीन का पक्ष लिया था वह सीपीआईएम कहलाया।
  4. 1976 से भारत व चीन के बीच राजनयिक संबंधें की पुनः शुरूआत हुई।
  5. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी 1988 की चीन यात्रा के बाद एक नयी शुरूआत हुई।
  6. सिक्किम के विलय पर भी चीन ने ऐतराज जताया।
  7. अरूणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र पर अभी चीन अपना अधिकार जता रहा है।
  8. दोनो देशों के मध्य व्यापारिक संबंध गतिमान है।
भारत-पाकिस्तान संबंध:-
  1. भारत विभाजन (1947) द्वारा पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध शुरू से ही कड़वे रहे है। कश्मीर मुद्दे पर 1947 में ही दोनों देशों की सेनाओं के बीच छाया-युद्ध छिड़ गया। इसी छाया युद्ध में पाकिस्तान ने कश्मीर के एक बड़े भाग पर अनाधिकृत कब्जा जमा लिया।
  2. 1948 में कबायलियों के वेश में पाक सेना का कश्मीर पर आक्रमण।
  3. सरक्रीक रेखा, सियाचिन ग्लेशियर, सीमापार आतंकवाद और कश्मीर दोनों के मध्य विवाद के मुख्य कारण है।
  4. 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में दोनों के बीच सिंधु नदी जलसंधि की गई। इस पर पं नेहरू और जनरल अयूब खाँ ने हस्ताक्षर किए। विवादों के बावजूद इस संधि पर ठीक-ठाक अमल रहा है।
  5. 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। ततकालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया। इस समय भारत में अकाल की स्थिति भी थी। हमारी सेना लाहौर के नजदीक तक पहुँच गई थी।
  6. संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के हस्तक्षेप से युद्ध समाप्त हुआ। 1966 में ताशकद समझौता हुआ जिसमें भारत की ओर से श्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खाँ ने हस्ताक्षर किए।
  7. 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनावों में पश्चिमी पाकिस्तान में पीपीपी के जुल्फिकार अली भुट्टी जबकि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अवामी लीग के शेख-मुजीबुर्रहमान (बंग-बंधु) विजयी हुए। दोनों भागों में संस्कृति एवं भाषा को लेकर गंभीर मतभेद थे। अवामी लीग ने एक परिसंघ बनाने की मांग रखी।
  8. पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में दमन के विरोध में जनता ने विद्रोह कर दिया। शेख मुजीब गिरफ्तार कर लिए गए। 80 लाख बांग्लादेशी शरणार्थी भारत में घुस आए। प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने इस मुक्ति संग्राम को अपना नैतिक एवं भौतिक समर्थन दिया।
  9. 1971 में पाकिस्तान को चीन तथा अमेरिका से मदद मिली। इस स्थिति में श्रीमति इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ की साथ 20 वर्षीय मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए।
  10. 1971 में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ पूर्णव्यापी युद्ध छेड़ दिया। भारत विजयी हुआ। पाकिस्तानी सेना ने 90000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। नये देश बांग्लादेश का उदय हुआ।
  11. 1972 में शिमला समझौता हुआ इस पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की ओर से जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए।
  12. 1999 में भारत ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने की पहल करते हुए दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की परन्तु पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कारगिल संघर्ष छेड़ दिया।
  13. कारगिल में अपने को मुजाहिद्दीन कहने वालों ने सामरिक महत्व के कई इलाकों जैसे द्रास, माश्कोह, वतालिक आदि पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना ने बहादुरी से अपने इलाके खाली करा लिए।
  14. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की भारत यात्रा तथा भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा दोनों देशो के बीच संबधों को सुधारने के लिए की गयी। लेकिन पाकिस्तान की और से ऐसी सीजफायर का उल्लंघन व आतंकी घुसपैठ की कार्यवाही ने दोनों देशों के संबंधों में कटुता पैदा की है।
  15. 1965 में पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ क्षेत्र की तरफ से आक्रमण किया व पराजित हुआ।
  16. 10 जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री व जनरल अयूब खान के बीच उज्बेकिस्तान (सोवियत संघ) के ताशकंद में समझौता हुआ।
  17. भारत पाक युद्ध 1971 - बांग्लादेश का निर्माण तथा इंदिरा गांधी व जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता।
  18. 1999 में पाकिस्तान से कारगिल को मुस्त कराने के लिए ऑपरेशन विजय चलाया।
  19. रेल-बस सुविधा का विस्तार तथा व्यापारिक संबंधों में विस्तार।
भारत की परमाणु नीति:- सर्वप्रथम 1974 में राजस्थान के जैसलमेर जिले मे पोखरण नामक स्थान पर भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। मई 1998 में पोखरण में ही दूसरा परमाणु परीक्षण किया।
  1. मई 1974 में पोखरण में भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया फिर मई 1998 में पोखरण में ही भारत ने पाँच परमाणु परीक्षण कर स्वयं को परमाणु सम्पन्न घोषित कर दिया। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण कर स्वयं को परमाणु शक्ति घोषित कर दिया।
  2. इन परीक्षणों के कारण क्षेत्र में एक नए प्रकार का शक्ति संतुलन बन गया। दोनों देशों पर अमेरिका सहित कई देशो ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।
  3. भारत ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि एवं 1995 की "व्यापक परीक्षण निषेध संधि" "CTBT" पर हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि भारत इन्हें भेदभावपूर्ण मानता है।
नीति:-
  1. परमाणु शक्ति का शान्तिपूर्ण उपयोग
  2. भेदभाव रहित परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध
  3. आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा परन्तु पहले प्रयोग वहीं करेगा।
  4. 1968 की परमाणु अप्रसार सन्धि (एनपीटी) भेदभाव पूर्ण है।
  5. 1995 की सी. टी. बी. टी. का विरोध
  6. भारत की परमाणु नीति भारत शांतिपूर्ण कार्यों हेतू परमाणु शक्ति का प्रयोग करेगा।
  7. भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकतानुसार परमाणु हथियारों का निर्माण करेगा।
  8. भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा।
  9. परमाणु हथियारो को प्रयोग करने की शक्तिसर्वोच्च राजनीतिक सत्ता के हाथ होगी।
  10. भारतीय विदेश नीति के बारे में राजनीतिक दल थोड़े बहुत मतभेदों के अलावा राष्ट्रीय अखण्डता, अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों के मसलों पर व्यापक सहमति है।
  11. 1991 में शीतयुद्र की समाप्ति के बाद विदेश नीति का निर्माण अमेरिका द्वारा पोषित उदारीकरण व वैश्वीकरण को ध्यान में रखकर किया जाने लगा तथा क्षेत्रीय सहयोग को भी विशेष महत्व दिया गया।
भारत की विदेश नीति पर देश के पहले प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री पं जवाहर लाल नेहरू की अमिट छाप है। नेहरू जी की विदेश नीति के तीन मुख्य उद्देश्य थे।
  1. संघर्ष से प्राप्त सम्प्रभुता को बचाए रखना।
  2. क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना।
  3. तेज गति से आर्थिक विकास करना।
  • नेहरू जी गुटनिरपेक्षता द्वारा आगे बढ़ना चाहते थे परन्तु डॉ. अम्बेडकर का मत था कि हमें अमेरिका के प्रति झुकाव वाली विदेश नीति बनानी चाहिए क्योंकि वह लोकतंत्र का बड़ा हिमायती है।
  • बांडुंग सम्मेलन :-
    प्रथम एफ्रो-एशियाई एकता सम्मेलन इंडोनेशिया के शहर बाडुग में 1955 में हुआ। यह नेहरू जी की एशियाई एवं अफ्रीकों नव स्वतंत्र देशों की एकता का प्रयास था। यही 1961 में बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के रूप में स्थापित हुआ।
  • बांडुंग सम्मेलन की दूसरी बैठक 2005 में इसकी 50वीं वर्षगांठ पर हुई जिससे 106 देशों ने भाग लिया।
    तीसरा बांडुंग सम्मेलन 2015 में 60वीं जयंती पर हुआ जिसमें 109 देशों ने भाग लिया।
  • भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए 1956 में मिस्त्र के खिलाफ ब्रिटेन के हमले का विरोध किया जो स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण करने के खिलाफ था।
भारत-चीन संबंध-
  • 1949 में चीनी क्रांति के बाद चीन की कम्यूनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाला भारत पहले देशों में एक था। नेहरू जी ने चीन से अच्छे संबंध बनाने की पहल की। उप-प्रधानमंत्री एवं तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आशंका जताई कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है। नेहरू जी का मत इसके विपरित यह था कि इसकी संभावना नहीं है।
  • जब 1950 में चीन ने तिब्बत पर अपना नियंत्रण जमा लिया। तिब्बती जनता ने इसका विरोध किया। भारत ने इसका खुला विरोध नहीं किया। तिब्बती धार्मिक नेता दलाई लामा ने अपने अनुयायियों सहित भारत से राजनीतिक शरण मांगी और 1959 में भारत ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी। चीन ने भारत के इस कदम को अपने अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी माना।
  • चीन और भारत के मध्य विवाद का दूसरा बड़ा कारण सीमा-विवाद था। चीन, जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से के अक्साई-चीन और अरूणाचल प्रदेश के अधिकतर हिस्सों पर अपना अधिकार जताता है।
  • 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। भारतीय सेना ने इसका कड़ा प्रतिरोध किया। परन्तु चीनी बढ़त रोकने में नाकामयाब रहे। आखिरकार चीन ने एक तरफा युद्ध विराम घोषित कर दिया।
  • चीन से हारकर भारत की खासकर नेहरू जी की छवि को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत नुकसान हुआ।
  • 1962 के बाद भारत-चीन संबंधों को 1976 में राजनयिक संबंध बहाल कर शुरू किया गया।
  • 1979 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी (विदेश मंत्री) तथा श्री राजीव गांधी ने 1962 के बाद पहले प्रधानमंत्री के तौर पर चीन की यात्रा की परन्तु चीन के साथ व्यापारिक संबंधों पर ही ज्यादा चर्चा हुई।
  • 2003 में भी अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के तौर पर चीन की यात्रा की जिसमें प्राचीन सिल्करूट (नाथूला दर्रा) को व्यापार के लिए खोलने पर सहमति हुई जो 1962 से बंद था। इससे यह मान्यता भी मिली कि चीन सिक्किम को भारत का अंग मानता है।
  • चीन द्वारा अरूणाचल प्रदेश में अपनी दावेदारी जताने, पाकिस्तान से चीन की मित्रता एवं भारत के खिलाफ चीनी मदद से भारत चीन संबंध खराब होते है। चीन और भारत सीमा विवाद सुलझाने के लिए प्रयत्नशील है।
  • सन् 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत का दौरा किया। इसमें मुख्य समझौता कैलाश मानसरोवर यात्रा हेतू वैकल्पिक सुगम सड़क मार्ग खोलना था।
  • मई 2016 में भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी चीन यात्रा पर गए है यह यात्रा चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के आतंकवादी अजहर मसूद के पक्ष में वीटो करने तथा परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) द्वारा यूरेनियम की भारत की आपूर्ति से पहले चीन द्वारा भारत को एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य करने जैसे जटिल मुद्दों की छाया में हो रही है।
महत्त्वपूर्ण बिंदु-
  1. स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् भारत ने लोकतंत्र कामय करने व जनता की भलाई करने की दो चुनौतियों का सामना किया। अंग्रेजी सरकार अपने पीछे अंतर्राष्ट्रीय विवादों की एक पूरी विरासत छोड़ गई थी, बँटवारे के कारण अलग से दबाव पैदा हुए थे और गरीबी मिटाने के काम के साथ भारत ने एक स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भागीदारी शुरू की।
  2. एक राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ था। ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। इस लक्ष्य की प्रतिध्वनि संविधान के अनुच्छेद 51 के नीति-निर्देशक तत्वों में सुनाई देती है।
  3. एक देश की विदेश नीति पर घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत की विदेश नीति के मुख्य रचनाकार माने जाते हैं, जिन्होंने तीन उद्देश्य अपने सामने रखे-संप्रभुता को बचाए रखना, क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना तथा तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना। इसलिए भारत ने अपने-आप को सैन्य गठबंधनों से दूर रखते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई।
  4. नेहरू के दौर में भारत ने एशिया व अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के साथ संपर्क बनाए। इस उद्देश्य के लिए भारत ने एशियाई संबंध सम्मेलन (मार्च 1947), इण्डोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में सम्मेलन (1949), अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के समर्थन में बांडुंग में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन (1955) का आयोजन किया।
  5. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांत यानी पंचशील (29 अप्रेल, 1954) भारत व चीन के बीच मजबूत संबंध की दिशा में एक अगला कदम था। मित्रता की दिशा में एक और कदम आगे बढ़ाने के लिए भारत ने चीनी क्रांति (1949) के बाद चीन की नई सरकार 'कम्युनिस्ट' की पैरोकारी संयुक्त राष्ट्र संघ में भी की।
  6. चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने को लेकर भारत और चीन के बीच विवाद होने शुरू हो गए। चीन ने भारतीय भू-क्षेत्र में पड़ने वाले दो इलाकों अक्साईचीन और नेफा (उत्तर-पूर्वी सीमांत) पर अपना अधिकार जताया। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लंबी-लंबी चर्चाएँ और बातचीत चलीं, लेकिन इसके बावजूद मतभेद सुलझाया नहीं जा सका। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा पर कई बार झड़पें हुई।
  7. भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में कहीं ज्यादा गंभीर किस्म के सैन्य संघर्ष की शुरुआत कश्मीर मसले से हुई। संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से इस लड़ाई का अंत हुआ और दोनों देशों के बीच 1966 में ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर हुए, लेकिन 1965 की लड़ाई में भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा।
  8. भारत की विदेश नीति में उसकी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय ताकत बनने की इच्छा परिलक्षित होती हैं, जोकि 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय सामने आई थी। उस समय पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच विवाद थे और भारत ने बांग्लादेश के स्वाधीनता संघर्ष में सहयोग किया तथा पाकिस्तान ने आत्म-समर्पण कर दिया। बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया। 3 जुलाई, 1972 को भारत और पाकिस्तान ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए और इससे अमन की बहाली हुई।
  9. भारत की परमाणु नीति में सैद्धांतिक तौर पर यह बात स्वीकार की गई है कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, लेकिन इन हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा। भारत की परमाणु नीति में यह बात दुहराई गई है कि भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभावहीन परमाणु नि:शस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है, ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो सके। पंडित जवाहरलाल नेहरु परमाणु हथियारों के खिलाफ थे, अतः उन्होंने परमाणु निःशस्त्रीकरण की नीति अपनाई और परमाणु निःशस्त्रीकरण संधि को भेदभावहीन बताया और भारत हमेशा से परमाणु हथियारों के शांतिपूर्ण प्रयोजनों प्रयोग के लिए वचनबद्ध रहा है।