नियुक्तिकरण-पुनरावृति नोट्स
CBSE कक्षा 12 व्यवसाय अध्ययन
(भाग-1) पाठ-6 नियुक्तिकरण
पुनरावृति नोट्स
नियुक्तिकरण प्रत्येक संगठन के लिए आवश्यक है। यह सही पद पर सही व्यक्ति का चुनाव करता है। सगंठन में मानव शक्ति एक प्रमूल्य संपत्ति है।
नियुक्तिकरण (Staffing) से अभिप्राय एक योग्य व कुशल व्यक्ति को भर्ती करना है। इसमें मानव संसाधन प्रबन्ध, भर्ती, चयन, अतिपूर्ति, पद्दोन्ति एवं रखरखाव समाहित होता है।
- नियुक्तिकरण का अर्थ है:- लोगों को काम पर लगाना। यह मनाव संसाधन के नियोजन से प्रारम्भ होता है तथा, भर्ती, प्रशिक्षण, विकास, पदोन्नति तथा कार्यदल के निष्पादन मूल्यांकन को शामिल करता है।
- नियुक्तिकरण की आवश्यकता तथा महत्व :
- योग्य कर्मचारी प्राप्त करना:- यह विभिन्न पदों के लिए योग्य कर्मचारियों को खोजने में सहायता करता है।
- बेहतर निष्पादन:- सही व्यक्ति को सही स्थान पर रखकर यह बेहतर निष्पादन को निश्चित करता है।
- निरन्तर विकास:- उचित नियुक्तिकरण उपक्रम के निरन्तर विकास को सुनिश्चित करता है।
- मानव संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग:- नियुक्तिकरण की सहायता से मानव संसाधनों को सर्वोत्तम उपयोग संभव है। आवश्यकता से अधिक कर्मचारियों को रखने से बचाव कर कर्मचारियों के काम उपयोग तथा उच्च-श्रम लागत को कम करता है।
- कर्मचारियों की कार्य संतुष्टि एवं मनोबल वृद्धि में सहायक:- उद्देश्यपूर्ण मूल्यांकन तथा कर्मचारियों के योगदान का यायोचित प्रतिफल के द्वारा कार्य संतोष में सुधार करता है तथा कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है।
- मानव संसाधन प्रबन्ध:-
कुशल मानवीय संसाधन उपलब्ध कराने का काम मानव संसाधन प्रबन्ध का है। इस काम को करने के लिए बड़ी संस्थाओ में मानव संसाधन विभाग स्थापित किया जाता है। यह विभाग मानव संसाधन प्रबन्धक की देखरेख में काम करता है। - परिभाषा-
मानव संसाधन प्रबन्ध के मानव संसाधन की भर्ती, चयन, विकास, उपयोग, क्षतिपूर्ति और अभिप्रेरणा को सम्मिलित किया जाता है। - नियुक्तिकरण मानव संसाधन प्रबन्ध के एक भाग के रूप में:-
मानव संसाधन प्रबन्ध का क्षेत्र नियुक्तिकरण की अपेक्षा विस्तृत है। इसके अंतगर्त नियुक्ति अभिलेख रखना, कर्मचारी नीतियों तैयार करना, कर्मचारी अनुसंधान करना, विशेषज्ञ प्रदान करना आदि को सम्मिलित किया जाता है। नियुक्तिकरण का अर्थ रिक्त पदों को भरना मात्र नहीं है, अपितु संस्था के लिए मानवीय तत्व की महत्वता को ध्यान में रखते हुए यह कार्य किया गया है। नियुक्तिकरण को मानव संसाधन प्रबन्ध के रूप में निम्नलिखित तरीके से देखा जाता है:-- नियुक्तिकरण प्रबन्ध का सर्वव्यापक कार्य है, इसे सभी स्तर के प्रबंधकों द्वारा किया जाता है।
- जैसे-जैसे संस्था का आकर बड़ा होता है, उसके कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ती है। कर्मचारियों का प्रभावी प्रबन्ध करने के लिए बड़ी संस्थाओ में एक अलग मानव संसाधन विभाग की स्थापना की जाती है जिसमें मानवीय प्रबन्ध के अनेक विशेषज्ञ होते है।
- नियुक्तिकरण में न केवल रिक्त पदों का भरना वरन् प्रशिक्षण, विकास और कार्य मूल्यांकन करना भी है।
- मानव संसाधन प्रबन्ध द्वारा किए जाने वाले विशेष कर्तव्य व क्रियाएँ
मानवीय संसाधन प्रबंध में व सभी क्रियाएँ और दायित्व शामिल हैं जो की एक मनुष्य को करने होते है। ये हैं-- भर्ती-उचित योग्यता वाले व्यक्तियों को ढूँढ़ना।
- कार्य से संबंधित सूचना एकत्रित करना और विश्लेषण करना।
- क्षतिपूर्ति तथा प्रोत्साहन योजनाओ का विकास।
- कर्मचारियों के विकास के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना।
- कर्मचारियों और प्रबंधको में संबंध स्थापित करना।
- शिकायतों और समस्याओ को सुलझाना और कानूनी समस्याओ को दूर करना।
- संगठनात्मक ढाँचे में सुधार करना।
- कानूनी क्षेत्रों से कंपनी की सुरक्षा करना।
- निष्कर्ष- मानव संसाधन प्रबंध एक विस्तृत अवधारणा है और नियुक्तिकरण इसका ही एक भाग है। नियुक्तिकरण को रेखा एवं कर्मचारी क्रिया दोनों ही नामों से जाना जाता है।
क्योंकि नियुक्तिकरण प्रबंध का कार्य नियोजन, संगठन, निर्देशन और नियंत्रण की तरफ कार्यात्मक क्षेत्र का अलग कार्य जैसे-विपणन प्रबंध और वित्तीय प्रबंध है।
- मानव शक्ति आवश्यकताओ का आकलन
इस प्रक्रिया के प्रथम चरण में संस्था में कितने और किस प्रकार के व्यक्तियो की आवश्यकता है, इसका का आकलन किया जाता है।
मानव शक्ति की आवश्यकताओ को समझने के लिए एक तरफ कार्यभार विश्लेषण की आवश्यकता है तथा दूसरी तरफ कार्य शक्ति विश्लेषण की।- कार्य-विश्लेषण- कार्य-विश्लेषण विभिन्न कार्यों के निष्पादन तथा संगठनात्मक उद्देश्य की पूर्ति के लिए कितनी संख्या में तथा किस प्रकार के मानव संसाधनों की आवश्यकता पड़ेगी इत्यादि इसके निर्धारण को सभंव बनाती है।
- कार्यशक्ति विश्लेषण- कार्यशक्ति विश्लेषण से पता चलता है की कितनी संख्या में तथा किस प्रकार में मानव संसाधन उपलब्ध है। वास्तव में इस प्रकार के अभ्यास यह प्रकट करते हैं कि संस्था में आवश्यकता से कम नियुक्तियाँ हैं या ज्यादा।
- भर्ती:- यह वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत मानव शक्ति की उपलब्धता के विभिन्न स्रोतों से संभावित कर्मचारियों की खोज की जाती है तथा उन्हें संस्था में प्रार्थना-पत्र भेजने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है।
- चयन:- इसके अंतर्गत विभिन्न कार्यों के लिए योग्य प्रार्थियों को चुना जाता है जिसके लिए रोजगार, परीक्षाएँँ लेना, साक्षात्कार एवं चिकित्सीय जाँच शामिल है।
- अनुस्थापन एवं अभिविन्यास:- जब की किसी नए कर्मचारी का संस्था में चयन किया जाता है तो उसे उस कार्य पर लगाया जाता है जिसके लिए वह उपयुक्त हो। अनुस्थापन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, क्योंकि इसके द्वारा ही सही कार्य पर सही व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है।
अभिविन्यास में नए कर्मचारी इसके द्वारा से परिचित कराया जाता है। नए कर्मचारी का उनकी इकाइयों, पर्यवेक्षकों और साथी कर्मचारियों से परिचय कराया जाता है। उन्हें काम के घंटो, छुट्टियाँ लेने की प्रक्रिया, चिकित्सा सुविधाओं इत्यादि की जानकारी भी दी जाती है। संस्था के इतिहास तथा संस्था में विभिन्न स्थानों पर उपलब्ध विभिन्न स्थानों पर उपलब्ध विभिन्न सुविधाओंं के विषय में बताया जाता है। - प्रशिक्षण एवं विकास:- व्यवस्थित प्रशिक्षण कर्मचारियों के ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि करने में सहायता करता है। कर्मचारियों के ज्ञान एवं कौशल को बढ़ाने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जाता है। विकास का अर्थ कर्मचारियों को सभी दृष्टियों में उन्नत व निपुण बनाना है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कर्मचारी अपना वर्तमान काम करने के लिए कौशल हासिल करते है और भविष्य में उच्चतर कार्य संभालने के लिए क्षमताओ को बढ़ाते है।
- निष्पादन एवं मूल्यांकन:- इसके अंतर्गत कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है। कर्मचारियों को स्थानांन्तरण एवं पदोन्नति इसी पर आधारित है।
- भर्ती:-
सम्भावित कर्मचारियों को भर्ती-ढूँढने तथा संगठन में काम करने के लिए आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया है। - भर्ती के स्त्रोतः-
- आन्तरिक स्त्रोत
- बाह्य स्त्रोत
- भर्ती के आंतरिक स्रोतः- आंतरिक स्रोत से तात्पर्य संगठन के भीतर प्रार्थियों को आमंत्रित करना है।
- भर्ती के आन्तरिक स्रोतों की विधिया : -
- स्थानांतरण:- इसमें कर्मचारियों को एक जगह से दूसरी जगह भेज देना शामिल है जैसे एक विभाग से दूसरे विभाग में या एक पारी से दूसरी पारी में भेजना।
- पदोन्नति:- इसमें कर्मचारी को निम्न पद से उच्च पदों पर भेजा देना शामिल है। जिसमें कर्मचारियों की जिम्मेदारी, सुविधा तथा भुगतान बढ़ जाते है।
- अस्थायी अलगाव (ले-ऑफ):- अस्थायी रूप में अलग किये गये कर्मचारियों का वापिस काम पर बुलाने को अस्थायी अलगाव के सत्रोत से भर्ती करना (ले-ऑफ) कहा जाता है। यह वह कर्मचारी है, जिन्हें काम की कमी के फलस्वरूप संस्था से अस्थायी रूप से अलग किया गया था।
- आन्तरिक स्त्रोतों के लाभ:-
- कर्मचारी अपने कार्य निष्पादन के सुधार के लिए प्रेरित होते है।
- आंतरिक भर्ती चयन प्रक्रिया को सरल कर देती है।
- कर्मचारियों के प्रशिक्षण एवं विकास पर समय बर्बाद नहीं होता।
- आन्तरिक भर्ती के स्त्रोत सस्ते है।
- आन्तरिक स्त्रोतों की सीमाएँ:-
- नयी प्रतिभाओ के संस्था में प्रवेश के अवसर कम होते है।
- कर्मचारी अकर्मण्य हो जाते है।
- कर्मचारियों के मध्य प्रतियोगिता में बाधा पड़ती है।
- कर्मचारियों का लगतार स्थानांतरण संगठन की उत्पादकता को घटा सकता है।
- भर्ती के बाह्य स्रोतः- जब कंपनी रिक्त पदों के लिए बाहर से आवेदन प्राप्त करती है तो उसे भर्ती के बाह्य स्रोत कहते हैं।
- भर्ती के बाह्य स्त्रोतों:-
- कैपस भर्ती- शिक्षण संस्थाएँ आज के समय में भर्ती का प्रमुख स्रोत हैं जिससे तकनीकी पेशेवर व प्रबंधकीय कार्य के लिए उम्मीदवारों को लेना आसान होता है। इसी के साथ ही बड़ी-बड़ी संस्थाएँ युवा व प्रतिभाशाली व्यक्तियों को प्रप्त करने के इच्छा से इन संस्थाओ से संपर्क में रहती है।
- प्रबंधक परामर्शदाता- प्रबंधकीय परामर्शक फर्में संगठन की तकनीकी व्यवसायिक तथा प्रबंधकीय कर्मचारियों की भर्ती में सहायता करती है।
- स्थापना एजेंसी- स्थापन एजेंसियों पूरे देश में कर्मचारियों की नियुक्ति में विशिष्टता प्राप्त हो व व्यक्तियों ब्यौरे रखती है। जिनके पास व्यक्तिगत योग्यताए व व्यक्तिगत कौशल होता है।
- रोजगार कार्यालय- सरकार द्वारा संचालित रोजगार कार्यालय पद पाने के इच्छुक कर्मचारी व नियुक्ति के बीच एक कड़ी का कार्य कर कर्मचारी की मांग पूर्ति का मिलान करने में सहयोग करती है।
- विज्ञापन- (अख़बार, पत्रिका, दूरदर्शन) रिक्त पदों के विज्ञापन पर संचार आजकल अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। अखबारों प्रकाशन उस समय प्रयोग किया जाता है जब आवश्यक पदों की नियुक्ति करनी होती है।
- प्रत्यक्ष भर्ती- प्रत्यक्ष भर्ती के अंतर्गत संगठन के सूचना पट पर एक अधि सूचना लगाई जाती है जिससे संस्था के रिक्त कार्य पदों व विवरण किया जाता है। कार्य पाने के इच्छुक संस्था के बाहर एक सुनिश्चित तिथि पर इकट्ठे होते है तथा उनके चयन की प्रक्रिया उस स्थान पर की जाती है।
प्रत्यक्ष भर्ती उन आकस्मिक पदों के लिए की जाती है जब अप्रशिक्षित व अकुशल कर्मचारी की आवश्यकता होती है। ऐसे कर्मचारी आकस्मिक अथवा बदली के नाम से जाने जाते है।
इन कर्मचारियों का पारिश्रमिक प्रतिदिन मजदूरी के आधार पर दिया जाता है। यह स्रोत उस समय उचित रहता है जब कार्य का दबाब हो या स्थायी कर्मचारी अनुपस्थित हों। - श्रम ठेकेदार- श्रम ठेकेदार मजदूरों से संपर्क बनाए रखते हैं। कम समय के नोटिस पर भी अकुशल श्रमिको को कमीशन के आधार पर उपलब्ध कराने से सक्षम होते है।
- आकस्मिक बुलावा- कई बार संस्थापक रिक्त पद न होने पर भी समय-समय पर आवदेन मँगवाते रहते हैं ताकि जैसे ही कोई रिक्त पद होता है उनमें से योग्य व्यक्तियों को बुला लिया जाता है।
लाभ- दूसरे स्रोतों के मुकाबले यह भर्ती का स्रोत सस्ता है। - कर्मचारियों की सिफारिश- कई संस्थाएँ अपने कर्मचारियों द्वारा सिफारिश किए गए मित्रो और संबंधियो को रोजगार के अवसर प्रदान करती है। ये आवेदक अच्छे कर्मचारी माने जाते है, क्योंकि इनकी जाँच प्रारंभिक स्तर पर हो जाती है।
- वेब प्रकाशन- इंटरनेट आजकल भर्ती का आम स्रोत माना जाता है। कुछ वेबसाइट विशेष रूप से बनाए जाते है जो कार्य पाने के इच्छुक तथा नए प्रवेशको से संबंधित सूचनाएँ देते है जैसे – www.naukri
- भर्ती के बहरी स्त्रोतों के लाभ
- योग्य कर्मचारी:- भर्ती के बाह्य स्त्रोत के प्रयोग से प्रबन्ध योग्य एवं प्रशिक्षत व्यक्तियों को संस्था के रिक्त पदों के लिए आवदेन का अवसर देती है।
- विस्तृत विकल्प:- प्रबंधकों के पास विस्तृत विकल्प उपलब्ध होते है।
- नयी प्रतिभाएँ:- नये विचारों का उपक्रम में समावेश होता है।
- प्रतियोगिता की भावना:- कर्मचारियों में प्रतियोगिता की भावना का विकास होता है।
- बाह्य स्त्रोत की कमियाँ / सीमाएँ:-
- वर्तमान कर्मचारियों में असन्तोष की भावना:- संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों में असन्तोष फैलता है क्योंकि वे महसूस करते है। की उनकी पदोन्नति के मौके घाट गए है।
- महंगी प्रक्रिया:- विज्ञापन आदि पर लागत अधिक आती है।
- लम्बी प्रक्रिया:- भर्ती प्रक्रिया में ज्यादा समय लगता है।
- चयन:- चयन एक प्रक्रिया है जो संगठन के भीतर व बाहर से वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की स्थिति के लिए उपयुक्त अभ्याथिर्यो को चुनौती है।
- चयन प्रक्रियो के विभिन्न चरण : -
- प्राथमिक जाँच:- आवेदन पत्रों के प्रप्त हो जाने के बाद एक जाँच समिति द्वारा आवेदन की योग्यता और अनुभव के संबंध में समूचित जाँच की जाती। आवेदकों को प्रारम्भिक परीक्षाओं के लिए बुलाया जाता है एवं अनूपयुक्त आवेदनों को अस्वीकार कर दिया जाता है।
- चयन परीक्षाओं के प्रकार
- बुद्धि परीक्षाएँ- यह उन महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परीक्षाओं में से एक है जिसका प्रयोग व्यक्ति के बुद्धिलब्धि स्तर को मापने के लिए किया जाता है यह व्यक्ति के सीखने की योग्यता अथवा निर्णय लेने तथा परखने की योग्यता को मापने का सूचक है।
- कौशल परीक्षा- यह व्यक्ति के नए कौशल को सीख की संभावित कुशलता को मापती है। यह व्यक्ति के विकास करने की क्षमता का संकेत करती है। ऐसी परीक्षाएँँ व्यक्ति के भविष्य में, सफलता के अंक को जानने का अच्छा संकेतक है।
- व्यक्तियों परीक्षाएँ- व्यक्तित्व परीक्षाएँ व्यक्ति के संवेगों, प्रतिक्रियाओं, परिपक्वता तथा उनके जीवन-मूल्यों को जानने में संकेत देती है। ये परीक्षाएँ पूरे व्यक्तित्व को परखने में सहायक है। इसलिए इनका निर्माण तथा क्रियावंपन दोनों ही कठिन है।
- व्यापार परीक्षा- ये परीक्षाएँ व्यक्ति के उपलब्ध कौशलों को मापती है। ये ज्ञान के स्तर तथा उनके क्षेत्र की व्यावसायिक तथा तकनीकी प्रशिक्षण की कुशलता को मापती है। कौशल परीक्षा तथा व्यापार परीक्षा में अंतर यह है की पहली परीक्षा व्यक्ति के कौशल अर्जित करने की संभावित क्षमता को मापती है तथा उन वास्तविक कौशलों को जो उनके पास पहले से ही है।
- अभिरूचि परीक्षा- हर व्यक्ति को किसी खास कार्य के प्रति आकर्षण रहता है। अभिरूचि परीक्षाओं का प्रयोग यह जानने के लिए किया जाता है की उसकी रूचि किस प्रकार की है अथवा उसका रुज्ञान किस प्रकार के कार्य की तरफ है।
- रोजगार साक्षात्कार:- इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है:-
- उम्मीदवार की उपयुक्तता ज्ञात कराना।
- उम्मीदवार के बारे में अधिक सूचनाएँ प्राप्त करना।
- उम्मीदवार को काम की शर्तो सहित काम की रुपरेखा बताना।
- संदर्भ जाँच:- अंतिम चयन से पूर्व भावी नियोक्ता सामान्यतः आवेदन द्वारा दिये गये संदर्भो की जाँच करता है। इसके अंतर्गत उम्मीदवार की पारिवारिक पृष्ठभूमि, पिछला रोजगार, शिक्षा, पुलिस रिकार्ड इत्यादि की पूरी छानबीन की जाती है।
- चयन निर्णय:- जो उम्मीदवार रोजगार परीक्षा एवं साक्षात्कार उत्तीर्ण कर लेते है ताकि जिसके संदर्भो की जाँच हो सकती है, योग्यता के आधार पर उनकी एक सूची बनाई जाती है तथा चयन का अंतिम निर्णय लिया जाता है।
- शारीरिक / डॉक्टर परीक्षण:- संस्था द्वारा नियुक्त एक योग्य चिकित्सक द्वारा यह प्रमाणित किया जाती है की उम्मीदवार संबंधित कार्य के लिए शारीरिक दृष्टि से उपयुक्त है या नही। उचित डॉक्टर परीक्षा से यह सुनिश्चित हो जाता है की कर्मचारी स्वस्थ है जिससे अनुपस्थिति दरें कम होगी।
- पद प्रस्ताव:- उम्मीदवार द्वारा चयन प्रक्रिया की सभी बाधाओं को पार कर लेने के बाद उसे एक नियुक्ति पत्र देकर औपचारिक रूप से नियुक्त कर लिया जाता है। नौकरी की व्यापक शर्तें, वेतनमान इत्यादि नियुक्ति पत्र के अभिन्न अंग होते है।
- रोजगार समझौता:- जब उम्मीदवार नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है तो उसे दी गई समय सीमा के भीतर स्वीकृति देनी होती है। स्वीकृति देने के पश्चात नियोक्ता और उम्मीदवार दोनों रोजगार समझौता पर हस्ताक्षर करते है, जिसमें मुख्यतः पद परिचय, नियुक्ति की तिथि, वेतन, अवकाश संबंधी नियम, रोजगार समाप्ति की शर्ते आदि दी जाती।
- प्रशिक्षण एवं विकास
- प्रशिक्षण:- प्रशिक्षण किसी विशिष्ट कार्य को कुशलतापूर्वक करने के लिए कर्मचारियों की जानकारी एवं तकनीकी कौशल बढ़ाने की गतिविधि है तथा नए कर्मचारियों को उनके काम से परिचित करता है उनके ज्ञान और कौशल को बढ़ाता है।
- विकास:- प्रबंधकों की वर्तमान पदों पर संपूर्ण प्रभावपूर्णता में सुधार करने एवं भविष्य में अधिक जिम्मेंदारी उठाने के लिए तैयार करने से है।
- प्रशिक्षण के लाभ
- संगठन को लाभ:-
- व्यस्थित सीखने के अवसर:- प्रशिक्षण कर्मचारी को व्यवस्थित तरीके से सिखने का अवसर प्रदान करता है जिससे अपव्यय कम होता है।
- अधिक लाभ:- कर्मचारी की उत्पादन की किस्म एवं मात्रा में सुधार होने से संस्था को अधिक भय होता है।
- श्रम–परिवर्तन दर एवं अनुपस्थिति में कमी:- प्रशिक्षित संस्था के वातावरण एवं अपने कार्य से अधिक संतुष्ट रहते है।
- पर्यवेक्षण की कम जरुरत:- प्रशिक्षित कर्मचारी अपने-अपने कार्य में निपूर्ण हो जाते है।
- कर्मचारियों को लाभ:-
- बेहतर कैशियर विकल्प:- कर्मचारी के ज्ञान एवं कौशल में सुधार से बेहतर, कैशियर विकल्प मिलते है।
- बेहतर कमाई:- बेहतर प्रदर्शन से कर्मचारी की बेहतर कमाई होती है।
- मनोबल में बढ़ावा:- कर्मचारी के संतुष्टि स्तर एवं मनोबल को बढ़ावा मिलता है।
- दुर्घटनाओ में कमी:- मशीनों को चलाने की कला को सीख कर दुघर्टनाओ को कम किया जा सकता है। यह कला प्रशिक्षण द्वारा आती है।
- प्रशिक्षण और विकास
प्रशिक्षण किसी विशिष्ट कार्य को करने के लिए तकनीकी ज्ञान देने से संबंधित है। किन्तु विकास एक व्यापक क्रिया है जो व्यक्ति की सभी क्षेत्रो में वृद्धि से संबंधित है, तथापि यह दोनों परस्पर सम्बन्धित क्रियाएं है। प्रशिक्षण कर्मचारियों को कार्य कौशल सीखने में सहायता करता है, जबकि विकास कर्मचारियों के दृष्टिकोण को विस्तृत करता है।क्र.सं. आधार प्रशिक्षण विकास 1. परिभाषा इसका अर्थ किसी विशिष्ट कार्य करने के लिए कौशल और ज्ञान प्रदान करना है। इसका अर्थ कर्मचारियों को सभी दृष्टियों से निपुण बनाना है। 2. उद्देश्य इसका उद्देश्य कर्मचारियों को उनके वर्तमान कार्य में कुशलता प्रदान करना है। विकास का संबंध भावी कार्यों के लिए क्षमताओं और कुशलताओ का विकास करने से है। 3. विधियां प्रशिक्षण कार्य पर प्रशिक्षण विधियों द्वारा प्रदान किया जाता है। विकास सेमिनार, सम्मेलन जैसी विधियों पर आधरित है। 4. पहल अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए अधिकारी द्वारा पहल की जाती है। अपनी उन्नति और विकास के लिए व्यक्ति स्वंय पहल करता है। 5. अवधि प्रशिक्षण कार्यक्रम अल्प अवधि के लिए चलाये जाते है। यह एकदीर्घकालीन प्रकिया है। 6. प्रकृति जॉब प्रधान कैशियर प्रधान 7. कर्मचारियों का स्तर अप्रबंधकीय स्तर प्रबंधकीय स्तर - प्रशिक्षण की विधियाँ
- आन दा जॉब विधियाँ:- यह उस जगह लागू होती है जब कर्मचारी वास्तव में काम कर रहे होते है- इसका अर्थ "जब करो तब सीखो"। इसकी मुख्य विधियाँ निम्नलिखित है:-
- प्रशिक्षणार्थी कार्यक्रम:- इसके अंतर्गत प्रशिक्षणार्थी को किसी अनुभवी व्यक्ति के पर्यवेक्षण में रखा जाता है जो उसे आवश्यक कौशल सिखाता है और उसके निष्पादन को नियंत्रित करता है। प्रशिक्षणार्थी को इसके लिए निर्वाह भत्ता भी मिलता है जिससे वह "सीखो और कमाओं" योजना का लाभ उठा सकता है।
- संयुक्त परीक्षण:- इस विधि के अंतर्गत शैक्षिक संस्थान अपने छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान देने के लिए औद्योगिक उपक्रमों क साथ समझौता कर लेते है। उदाहरण के लिए चिकित्सा छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान के लिए बड़े अस्पतालों में भेजा जाता है।
- अभिविन्यास प्रशिक्षण:- यह प्रशिक्षण एक नए कर्मचारी को दिए गए प्रशिक्षण का एक प्रकार हैं, जिसमें नए कर्मचारी को अन्य कर्मचारियों व्यवसायिक परिवेश, नौकरी और व्यापार के साथ परिचित कराने के द्वारा, संस्थान में शीघ्रता से स्थापित होने में मदद की जाती है, प्रशिक्षण से इस प्रकार की अवधि कुछ घंटो से कुछ महीनों तक को सकती है। अभिविन्यास प्रशिक्षण, वास्तव में नवागंतुक का समूहीकरण करने के लिए और कंपनी के समग्र रणनीति, मानको के प्रदर्शन आदि के लिए सुअवसर प्रदान करता है, अगर यह ध्यान से किया जाये तो समय और लागत (प्रभावशीलता या दक्षता आदि में वृद्धि द्वारा) की बचत करता है।
- कार्य से परे प्रशिक्षण:- प्रशिक्षार्थियो को काम से अलग एक स्थान पर प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका मुख्य आधार "करने से पहले सीखना" है।
- प्रकोष्ठशाला प्रशिक्षण:- इसके अंतर्गत नए कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से, अलग से एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की जाती है। एक केंद्र में औजारों एवं मशीनों को इस ढंग से लगाया जाता है ताकि कारखाने जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाए।