कांग्रेस प्रणाली चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना - पुनरावृति नोट्स

CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
पुनरावृति नोटस भाग-2 पाठ-5
कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

स्मरणीय बिंदु-
  • पण्डित नेहरू की मृत्यु (मई 1964) से लेकर 11 जनवरी 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री रहे। शास्त्री जी के बाद कांग्रेस सिंडीकेट के मोरारजी के बजाय इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया कि वे अनुभवहीन है और दिशा निर्देश हेतु सिंडिकेट पर निर्भर रहेगी।
  • चौथा आम चुनाव (1967):- दो प्रधानमंत्री की मृत्यु नये प्रधानमंत्री का कम अनुभवी होना, मानसून की असफलता, खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा कमी, सैन्य खर्चे में वृद्धि से आर्थिक स्थिति विकट होने पर विपक्षी दलों ने लामबन्द होकर जन-आन्दोलन किए।
  • कांग्रेस - पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास व केरल (9 राज्यों) में सरकार न बना सकी। इन राज्यों में कांग्रेस के अलावा दूसरे दलों की दलबदल तथा गठबंधन से सरकार बनी।
  • द्रविड़ मुनेत्र कषगम् - इस दल को मद्रास प्रांत (तमिलनाडु) में द्रविड़ संस्कृति का समर्थन तथा हिंदी विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करके सत्ता प्राप्त की।
  • सिंडिकेट:- ‘सिंडिकेट’ कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का समूह था। इसमें निम्न लोग शामिल थे।
    1. मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री - के कामराज
    2. बम्बई से - एस के पाटिल
    3. मैसूर (कर्नाटक) - के एस निजलिंगप्पा
    4. आंध्र प्रदेश - नीलम संजीव रेड्डी
    5. पश्चिम बंगाल - अतुल्य घोष
  • कांग्रेस विभाजन (1969) - इंदिरागांधी ने सिंडिकेट से अलग उपराष्ट्रपति वी. वी. गिरि को प्रत्याशी बनाया। इन्दिरा गाँधी ने निर्वाचको से अंर्तआत्मा की आवाजे सुनने को कहां और चुनाव में वी. वी गिरि विजयी हुए।
  • कांग्रेस विभाजन (1969)-राष्ट्रपति चुनाव में हार से खिन्न होकर सिंडिकटे ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निष्कासित किया था इस प्रकार कांग्रेस का दो भागों में विभाजन
    1. कांग्रेस आर्गेनाइजेशन (O पुरानी कांग्रेस)
    2. कांग्रेस रिक्विजिनिस्ट (R नई कांग्रेस)
  • ग्रैंड अलांयस - 1971 के चुनाव से पूर्व सभी बड़े और कांग्रेसी गैर साम्यवादी दलो का गठबंधन
  • कांग्रेस पुनस्थार्पना के प्रयास:- इंदिरा गांधी के द्वारा निम्न प्रयास किये गयें।
    1. गरीबी हटाओं का नारा
    2. प्रिवीपर्स की समाप्ति
    3. बैंको का राष्ट्रीयकरण
    4. भूमि सुधार और हदबंदी विधेयक
    5. वंचितो, दलितो, अल्पसंख्यको, महिला व बेराजगारों की सहायता।
  1. प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू मई 1964 में गुजर गए थे। 1960 के दशक को 'खतरनाक दशक' कहा जाता है, क्योंकि गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन आदि के सवाल अभी अनसुलझे थे। संभव था कि इन सारी कठिनाइयों के कारण देश में लोकतंत्र की परियोजना असफल हो जाती अथवा खुद देश ही बिखर जाता।
  2. भारत ने 1964 से 1966 तक लालबहादुर शास्त्री (प्रधानमंत्री रहे) के समय में दो बड़ी चुनौतियों का सामना किया, जैसे-भारत-चीन युद्ध 1962 के कारण पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयाँ, भारत-पाक युद्ध 1965, मानसून की असफलता, सूखा, खाद्यान्न-संकट, जो कि प्रसिद्ध नारे 'जय जवान, जय किसान' के साथ इन चुनौतियों से निपटने के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
  3. शास्त्री जी की मृत्यु से कांग्रेस पार्टी के सामने राजनीतिक उत्तराधिकारी का सवाल उठ खड़ा हुआ। इस बार मोरार जी देसाई और इंदिरा गांधी के बीच कड़ा मुकाबला था और कांग्रेस के सांसदों ने फैसले के लिए गुप्त मतदान किया। इंदिरा गांधी ने मोराजी देसाई को हरा दिया और पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।
  4. इंदिरा गांधी की सरकार ने 1967 के आर्थिक संकट को रोकने के लिए रुपये का अवमूल्यन करने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, पहले के वक्त में 1 अमरीकी डॉलर जिसकी कीमत 5 रुपये थी, अब बढ़कर 7 रुपये हो गई। लोग आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, बढ़ती हुई बेरोज़गारी और देश की दयनीय आर्थिक स्थिति को लेकर विरोध पर उतर आए। साम्यवादी और समाजवादी पार्टी ने व्यापक समानता के लिए संघर्ष छेड़ दिया।
  5. कांग्रेस पार्टी के अवमूल्यन के निर्णय ने गैर-कांग्रेसवाद को जन्म दिया, जिसमें अलग-अलग नीतियाँ व आदर्श शामिल थे। इसे लोकतांत्रित कारणों के लिए जरूरी बताया गया।
  6. चौथा आम चुनाव 1967 में हुआ, जो कि कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहा। राजनीतिक नेता तमिलनाडु से कामराज, महाराष्ट्र से एस०के० पाटिल, पश्चिमी बंगाल से अतुल्य घोष और बिहार से के०बी० सहाय को हारना पड़ा और दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस ने बहुमत खो दिया। चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी, जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला और उनको मिलाकर एक गठबंधन बनाया गया, जिसे 'राजनीतिक भूकम्प' की संज्ञा दी गई।
  7. 1967 के चुनाव ने गठबंधन की परिघटना को जन्म दिया और अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया। बिहार में बनी संयुक्त विधायक दल की सरकार में दो समाजवादी पार्टियाँ-एस०एस०पी० व पी०एस०पी० शामिल थीं। जिसमें सी०पी०आई० (वामपंथी) और जनसंघ (दक्षिणपंथी) थे। पंजाब में संयुक्त विधायक दल पापुलर युनाइटेड फ्रेंट कहा गया, इसमें उस वक्त के दो परस्पर प्रतिस्पर्धी अकाली दल-संत ग्रुप व भास्कर ग्रुप शामिल थे।
  8. 1967 के तुरन्त बाद, इंदिरा गांधी को दो चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें सिंडिकेट के प्रभाव से स्वतंत्र अपना मुकाम बनाने की जरूरत थी और कांग्रेस ने 1967 के चुनाव में जो जमीन खोई थी, उसे भी उन्हें हासिल करना था। इंदिरा गांधी ने बड़ी साहसिक रणनीति अपनाई। उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया तथा सरकार की नीतियों को वामपंथी रंग देने के लिए कई कदम उठाए। मई 1967 में दस सूत्रीय कार्यक्रम अपनाया गया, जिसमें बैंको पर सामाजिक नियंत्रण, आम बीमा के राष्ट्रीयकरण, शहरी संपदा और आय के परिसीमन, खाद्यन्न का सरकारी वितरण, भूमि सुधार तथा ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देने के प्रावधान शामिल थे।
  9. कांग्रेसी नेताओं के एक समूह को अनौपचारिक तौर पर 'सिंडिकेट' के नाम से इंगित किया जाता था। इसमें के० कामराज, एस०के० पाटिल, एन० संजीव रेड़ी, अतुल्य घोष जैसे नेता शामिल थे, जिनका पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था। इंदिरा गांधी के पहले मंत्रीपरिषद् में इस समूह की निर्णायक भूमिका रही और इसने नीतियों के निर्माण व क्रियान्वयन में भी अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस के विभाजित होने के बाद सिंडिकेट के नेता और उनके प्रति निष्ठावान कांग्रेसी कांग्रेस (ओ) में ही रहे, बल्कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) ही 1971 के बाद भी लोकप्रियता की कसौटी पर सफल रही।
  10. सिंडिकेट और इंदिरा गांधी के बीच की गुटबाजी 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव के समय खुलकर सामने आ गई। कूटनीतिक तरीके से इंदिरा गांधी के सांसद ने सिंडिकेट के सांसद को हरा दिया (वी०वी० गिरि ने नीलम संजीव रेड्डी को), जिसने कांग्रेस को दो पार्टियों में बाँट दिया, जैसे कांग्रेस (ओ) अर्थात् ऑर्गनाइजेशन या 'पुरानी कांग्रेस', जिसका नेतृत्व सिंडिकेट ने किया और कांग्रेस (आर) अर्थात् रिक्विजिनिस्ट या 'नई कांग्रेस', जिसका नेतृत्व इंदिरा गांधी ने किया।
  11. हर किसी को संगठन की वास्तविक शक्ति कांग्रेस (ओ) के हाथ में मालूम पड़ती थी। दूसरी ओर, एस० एस०पी० , पी०एस०पी०, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय क्रांति दल ने इंदिरा गांधी के खिलाफ एक बडा गठबंधन बनाया, जिसकी नीति व कार्यक्रम था 'इंदिरा हटाओ"।
  12. इसके विपरीत इंदिरा गांधी ने लोगों के सामने एक सकारात्मक कार्यक्रम रखा और इसे अपने मशहूर नारे 'गरीबी हटाओ' के जरिये एक शक्ल प्रदान किया। गरीबी हटाओ के नारे से इंदिरा गांधी ने वंचित तबकों खासकर भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला और बेरोज़गार नौवजानों के बीच अपने समर्थन का आधार तैयार करने की कोशिश की। इसके सहारे वे अपने लिए 1971 के चुनावों के लिए एक देशव्यापी राजनीतिक समर्थन की बुनियाद तैयार करना चाहती थीं।
  13. इंदिरा गांधी ने पुरानी कांग्रेस को पुर्नजीवित करने का काम नहीं किया, बल्कि इसे नई तर्ज पर बनाया, जिसमें कुछ सामाजिक वर्गों, जैसे-गरीब, महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक को स्थान मिला। इस प्रकार इंदिरा गांधी ने कांग्रेस-प्रणाली को पुनस्र्थापित जरूर किया, लेकिन कांग्रेस–प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।
  14. 1965 के युद्ध की समाप्ति के सिलसिले में 1966 में सोवियत संघ के ताशकंद (वर्तमान में उज्बेकिस्तान की राजधानी) में भारत व पाकिस्तान के मध्य ताशकंद समझौता हुआ। ताशकंद समझौते पर भारत की तरफ से लाल बहादुर शास्त्री व पाकिस्तान की तरफ से मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किये।
  15. जो दल अपने कार्यक्रम व विचारधाराओं के धरातल पर एक दूसरे से अलग थे, एकजुट हुये तथा उन्होंने सीटों के मामले में चुनावी तालमेल करते हुये एक कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया। समाजवादी नेता राम मनोहर लेाहिया ने इस रणनीति को गैर-कांग्रेसवाद का नाम दिया।
  16. चुनावों के जनादेश को 'राजनैतिक भूकम्प' की संज्ञा दी गयी क्योंकि कांग्रेस पहली बार चुनाव हारी थी। उसे प्राप्त वोटों के प्रतिशत व सीटी की संख्या में कमी आयी थी।
  17. 1967 के चुनावों से राज्यों में गठबंधन की परिघटना सामने आयी। गैर कांग्रेसी पार्टियों ने एक जुट होकर SVD (संयुक्त विधायक दल) बनाया। पंजाब में बनी SVD की सरकार को “Popular United Front कहा गया।
  18. दल बदल - जब कोई जन प्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीत जाये व चुनाव जीतने के बाद उस दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाये तो इसे दल-बदल कहते हैं।
  19. 1967 के चुनावों के बाद काग्रेस के एक विधायक (हरियाणा) गयालाल ने एक पखवाड़े में तीन बार पार्टी बदली, उनके ही नाम पर 'आयाराम-गयाराम' का जुमला बना। यह जुमला दल बदल की अवधारणा से संबंधित हैं।
  20. कांग्रेस के भीतर प्रभावशाली व ताकतवर नेताओं के समूह को अनौपचारिक तौर पर सिंडिकेट कहा जाता था। इस समूह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।
  21. देसी रियासतों का विलय भारतीय संघ में करने से पहले सरकार ने रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार की निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार दिया तथा सरकार की तरफ से कुछ विशेष भत्ते देने का भी आवश्वासन दिया। यह दोनों (निजी संपदा व भत्ते) इस बात को आधार मान कर तय की जायेगी कि उस रियासत का विस्तार, राजस्व व क्षमता कितनी है। इस व्यवस्था को प्रिवी पर्स कहा गया)
  22. इंदिरा गांधी ने 1967 के चुनावों की खोई जमीन प्राप्त करने के लिये दस वितरण, भूमि सुधार आदि शामिल थे।
  23. 1971 के चुनावों में गैर-साम्यवादी तथा गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने चुनावी गठबंधन 'ग्रैंड अलायंस' बनाया।
  24. चुनाव परिणाम
    1. कांग्रेस 'आर' व सी.पी. आई - 375 सीट
    2. गठबंधन - 352 काग्रेस R+23 कप्युनिस्ट पार्टी
    3. कांग्रेस 'O' - 16 सीट
    4. ग्रैंड अलायंस - 40 से भी कम सीट
चुनौतियाँ:-
  1. राजनैतिक उत्तराधिकार की चुनौती:-
    1964 के मई में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। शास्त्री जी का 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में निधन हो गया। शास्त्री जी की मृत्यु के बाद मोरारजी देसाई व इंदिरा गांधी के मध्य राजनैतिक उत्तराधिकारी के लिये संघर्ष हुआ व इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। सिंडिकेट ने इंदिरा गाँधी को अनुभवहीन होने के बावजूद प्रधानमंत्री बनाने में समर्थन दिया, यह मान कर वे दिशा निर्देशन के लिये सिंडीकेट पर निर्भर रहेंगी। नेतृत्व के लिये प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया।
  2. चौथा आम चुनाव 1967:-
    मानसून की असफलता, व्यापक सूखा, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, नियति में गिरावट तथा सैन्य खर्चे में बढ़ोतरी से देश में आर्थिक संकट की स्थिति।
    विपक्षी दलों ने जनता को लामबंद करना शुरू कर दिया ऐसी स्थिति में अनुभवहीन प्रधानमंत्री का चुनावों का सामना करना भी एक बड़ी चुनौती थी।
    चुनावों के नतीजों को राजनैतिक भूकम्प का संज्ञा दी गयी। कांग्रेस 9 राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, पं.बंगाल, उड़ीसा, मद्रास व केरल) में सरकार नहीं बना सकी। ये राज्य भारत के किसी एक भाग में स्थित नहीं थे।
  3. कांग्रेस का विभाजनः-
    सिंडीकेट व इंदिरा गांधी के मध्य बढ़ते मतभेद व राष्ट्रपति चुनाव (1969) में इंदिरा गांधी समर्थित उम्मीदवार वी.वी. गिरी की जीत व कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार एन.सजीव रेड्डी की हार से कांग्रेस को 1969 में कांग्रेस को विभाजन की चुनौती झेलनी पड़ी। कांग्रेस (आर्गनाइजेशन) व कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) में विभाजित हो गयी।
  4. 1971 के चुनावों में इंदिरा गांधी ने अपने जनाधार की खोयी हुयी जमीन को पुनः प्राप्त करते हुये, गरीबी हटाओ के नारे से कांग्रेस को एक बार पुनः स्थापित कर दिया।