क्षेत्रीय आकांक्षाएँ - एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर

CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर
पाठ-8
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

1. निम्नलिखित में मेल करें:
क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृतिराज्य
(क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य का निर्माण(i) नगालैंड/मिजोरम
(ख) भाषाई पहचान और केंद्र के साथ तनाव(ii) झारखंड/छत्तीसगढ़
(ग) क्षेत्रीय असंतुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण(iii) पंजाब
(घ) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी माँग(iv) तमिलनाडु
उत्तर- (क)-(iii)
(ख)-(iv)
(ग)-(ii)
(घ)-(i)

2. पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे? क्या ये प्रावधान पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच तनाव बढ़ाने के कारण बन सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर- पंजाब में सामान्य स्थिति कायम करने के उद्देश्य से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और नरमपंथी अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरचंदसिंह लोंगोवाल के बीच 1985 के जुलाई में एक समझौता हुआ, जिसे पंजाब समझौता के नाम से जाना जाता है। इस समझौता के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे-
  1. इस बात पर सहमति हुई कि चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा।
  2. पंजाब और हरियाणा के बीच सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी।
  3. समझौते में यह तय किया गया कि, पंजाब-हरियाणा-राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे के बारे में फैसला करने के लिए एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) बैठाया जाएगा।
  4. समझौते के अंतर्गत सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई।
  5. पंजाब से विशेष सुरक्षा बल अधिनियम को वापस लेने की बात पर भी सहमति हुई। पंजाब समझौता पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों में शांति स्थापित करने की मंशा से प्रेरित थी। फिर भी  शांति बहाल करना इतना आसान भी नहीं था। समझौते के बाद लगभग एक दशक तक हिंसा का चक्र चलता रहा।
उदाहरणार्थ-
  1. उग्रवादी हिंसा और इस हिंसा को दबाने के लिए की गई कार्रवाईयों में मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ। साथ ही पुलिस की ओर से भी ज्यादतियाँ हुई।
  2. केंद्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा था। इसके कारण राज्य में सामान्य राजनीतिक और चुनावी प्रक्रिया बाधित हुई।
  3. संशय और हिंसा से भरे माहौल में राजनीतिक प्रक्रिया को दोबारा पटरी पर लाना मुश्किल था। शायद यही कारण था कि 1992 में जब पंजाब में चुनाव हुए, तो मात्र 24 फीसदी मतदाता वोट डालने के लिए आए। स्पष्टत: उपर्युक्त घटनाओं ने पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों में तनाव बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
  4. अकाली दल बिखर गया।

3. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने के क्या कारण थे?
उत्तर- 1970 के दशक में अकालियों के एक तबके ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठाई। आनंदपुर साहिब में, 1973 में, हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात उठाई गई थी। प्रस्ताव की माँगों में निम्न मुद्दे शामिल थे-
  1. केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करना।
  2. इस प्रस्ताव में सिख 'कौम' की आकांक्षाओं पर बल देते हुए सिखों के 'बोलबाला' (प्रभुत्व या वर्चस्व) का ऐलान किया गया।
  3. यह प्रस्ताव संघवाद को मज़बूत करने की अपील करता है। लेकिन इसे एक सिख राष्ट्र की माँग के रूप में भी देखा जा सकता हैं। लेकिन यह प्रस्ताव विवादों के घेरे में आ गया। इसके पीछे निम्न कारण थे-
    1. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का सिख जनसमुदाय पर बहुत कम असर पड़ा।
    2. कुछ साल बाद अर्थात् 1980 में अकाली दल की सरकार बखास्त हो गई और उसने अपना महत्व खो दिया।
    3. अकाली दल ने पंजाब और पड़ोसी राज्यों के मध्य  पानी के बँटवारे के मुद्दे पर एक आदोलन चलाया।
    4. यह आंदोलन बहुत जल्दी नरमपंथी अकालियों के हाथ से निकलकर चरमपंथी तत्वों के हाथ में चला गया और सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। इन सभी घटनाओं के लिए आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को जिम्मेदार ठहराया गया।

4. जम्मू-कश्मीर की अंदरूनी विभिन्नताओं की व्याख्या कीजिए और बताइए कि इन विभिन्नताओं के कारण इस राज्य में किस तरह अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया है।
उत्तर- जम्मू-कश्मीर में तीन राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र शामिल हैं-जम्मू कश्मीर और लद्दाख।
  1. कश्मीर क्षेत्र वास्तव में कश्मीर घाटी है, यहाँ अधिकांश लोग कश्मीरी बोलने वाले मुस्लिम हैं। कश्मीरी-भाषी लोगों में अल्पसंख्यक हिंदू भी शामिल हैं।
  2. जम्मू क्षेत्र पहाड़ी तलहटी एवं मैदानी इलाके का मिश्रण है, जहाँ हिंदू मुस्लिम और सिख यानि कई धर्म और भाषाओं के लोग विधमान हैं।
  3. लद्दाख पर्वतीय इलाका है, जहाँ बौद्ध एवं मुस्लिमों की आबादी है, लेकिन यह आबादी बहुत कम है।
इन अंदरूनी विभिन्नताओं ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को जन्म दिया है। 1989 से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी राजनीति ने सर उठाया। इसने कई रूप लिए और इस राजनीति की कई धाराएँ हैं-
  1. अलगाववादियों का एक तबका कश्मीर को अलग राष्ट्र बनाना चाहता है यानि एक ऐसा कश्मीर जो न पाकिस्तान का हिस्सा हो और न भारत का।
  2. कुछ अलगाववादी समूह चाहते हैं कि कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो।
  3. अलगावादी राजनीति की तीसरी धारा के समर्थक चाहते हैं कि कश्मीर भारत संघ का ही हिस्सा रहे, लेकिन उसे और स्वायत्तता दी जाए।
    वर्तमान समय में, अलगाववादी समूह अपनी बातचीत में भारत संघ के साथ कश्मीर के रिश्ते को पुनर्परिभाषित करने पर जोर दे रहे हैं।

5. कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष क्या हैं? इनमें कौन-सा पक्ष आपको समुचित जान पड़ता है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष निम्न हैं :
  1. भारत सरकार ने कश्मीरियों से वायदा किया था कि कबायली घुसपैठियों से निपटने के पश्चात जब स्थिति सामान्य हो जाएगी, तब भारत संघ में विलय के मुद्दे पर जनमत-संग्रह कराया जाएगा। इसे पूरा नहीं किया गया। अत: जनमत-संग्रह की माँग उठने लगी।
  2. धारा 370 के अंतर्गत दिया गया विशेष दर्जा पूरी तरह से अमल में नहीं लाया गया। इससे स्वायत्तता की बहाली अथवा राज्य को  ज्यादा स्वायत्तता देने की माँग उठी।
  3. भारत के बाकी हिस्सों में जिस तरह लोकतंत्र पर अमल होता है, उसी प्रकार का संस्थागत लोकतांत्रिक बरताव जम्मू-कश्मीर में नहीं होता।

6. असम आंदोलन सांस्कृतिक अभिमान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।
उत्तर- 1979 से 1985 तक असम आंदोलन बाहरी लोगों के खिलाफ चला। असमी लोगों कोदर था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बसी हुई है। लोगों के मन में यह भावना घर कर गई थी कि इन विदेशी लोगों को पहचानकर इन्हें अपने देश नहीं भेजा गया, तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी |
कुछ आर्थिक मसले थे। असम में चाय, तेल, और कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी के बाद भी वजूद गरीबी थी। यहाँ तक की जनता का मानना था कि असम के प्राकृतिक संसाधन बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा है |

7. हर क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर इस तथ्य की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। क्षेत्रीय मुद्दे की अभिव्यक्ति कोई असामान्य अथवा लोकतांत्रिक राजनीति के दायरे से बाहर की घटना नहीं है। लेकिन हर क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। निम्न उदाहरणों से इस तथ्य की पुष्टि होती है-
  1. देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग करते हुए जनआंदोलन चलायें गये। मौजूदा आध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे ही आंदोलनों वाले राज्य हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों-खासकर तमिलनाडु में हिंदी को राजभाषा बनाने के खिलाफ विरोध-आदोलन चला। 1950 के दशक के उत्तरार्ध से पंजाबी-भाषी लोगों ने अपने लिए एक अलग राज्य बनाने की आवाज़ उठानी शुरू कर दी। फलत: 1966 में पंजाब और हरियाणा नाम से राज्य बनाए गए।
  2. मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों में भी चकमा शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है।
  3. पंजाब में उठा आदोलन प्रदेश के लिए क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग से प्रेरित था, न कि अलगाववादी राजनीति से।
  4. त्रिपुरा में भी अप्रवास की समस्या का समाधान नहीं हुआ है, जिसके कारण वहाँ पर स्थिति गंभीर बनी हुई है। यहाँ के मूल निवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं।
  5. असम में उठा आंदोलन बाहरी लोगों के खिलाफ था। असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बसी हुई है। लोगों के मन में यह भावना घर कर गई थी कि इन विदेशी लोगों को पहचानकर इन्हें अपने देश नहीं भेजा गया, तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी। अत: उन्होंने ऐसे लोगों को निकालने के लिए आदोलन चलाया।
  6. पुर्तगाल से आज़ादी पाने के लिए गोवा में आदोलन चला था। अंतत: भारतीय सेना की सहायता से उसे अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया। गोवा, दमन और दीव संघशासित प्रदेश बन गए और 1987 में गोवा भारत संघ का एक राज्य बन गया।

8. भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय माँगों से 'विविधता में एकता' के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क दीजिए।
उत्तर-
  1. भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनायायगा है। लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है तथा लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता।
  2. इसके अलावा लोकतांत्रिक राजनीति में इस बात के पूरे अवसर होते हैं कि विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं की नुमाइंदगी करें।
  3. इस प्रकार लोकतांत्रिक राजनीति की प्रक्रिया में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और ज्यादा बलवती हैं। साथ ही लोकतांत्रिक राजनीति का अर्थ यह भी है कि क्षेत्रीय मुद्दों और समस्याओं पर नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समुचित ध्यान दिया जाएगा और उन्हें इसमें भागीदारी दी जाएगी।
  4. ऐसी व्यवस्था में कभी-कभी तनाव या परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। कभी ऐसा भी हो सकता है कि राष्ट्रीय एकता के सरोकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं और जरूरतों पर भारी पड़े। कभी ऐसा भी हो सकता है कि कोई क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूद ले।
    जो राष्ट्र यह चाहते हैं कि साथ ही राष्ट्र की एकता भी बनी रहे, वहाँ क्षेत्रों की ताकत, विविधताओं का सम्मान हो, उनके अधिकार और अलग अस्तित्व के मामले पर राजनीतिक संघर्ष का होना एक साधारण बात है।

9. नीचे लिखे अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:
हजारिका का एक गीत... एकता की विजय पर है; पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इस गीत में एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है... मेघालय अपने रास्ते गई... अरुणाचल भी अलग हुई और मिजोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह दूसरी बेटी से ब्याह रचाने को खड़ा है... इस गीत का अंत असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमों को भी अपने साथ एकजुट रखने की बात कही गई है... करबी और मिजिग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं।
-संजीब बरुआ
(क) लेखक यहाँ किस एकता की बात कर रहा है?
(ख) पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के कुछ राज्य क्यों बनाए गए?
(ग) क्या आपको लगता है कि भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर एकता की यही बात लागू हो सकती है? क्यों?
उत्तर- (क) कवि असमी लोगों की एकता के बारे में बात कर रहा है।
(ख) पुराने राज्य असम से अलग होकर करके पूर्वोत्तर के अन्य राज्य इसलिए बनाए गए, क्योंकि उन्हें लगने लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है।
(ग) हाँ, भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर एकता की यह बात लागू हो सकती है, क्योंकि भारत सरकार ने क्षेत्रीय विभिन्नताओं और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है।