लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट - पुनरावृति नोट्स
CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
पुनरावृति नोटस
भाग-2 पाठ-6
लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
पुनरावृति नोटस
भाग-2 पाठ-6
लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
स्मरणीय बिंदु-
सन् 1973 में सन् 1975 के बीच आये बदलावों और घटनाओं की परिणति देश में आपातकालीन लागू करने के रूप में हुई इन घटनाओं को हम आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व न्यायायिक संदर्भो में समझ सकते है।
- गैरकांग्रेसी पार्टियों ने कांग्रेस की निजीवादी राजनीति के कारण इसका विरोध किया। मार्क्सवादी-लेनिनवादी समूह पश्चिमी बंगाल में ज्यादा सक्रिय थे, जिन्होंने मौजूद राजनीतिक प्रणाली और पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया और राज्यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। पं० बंगाल की सरकार ने इन्हें दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।
- पहला राष्ट्रवादी सत्याग्रह जयप्रकाश नारायण द्वारा इंदिरा गांधी के इस्तीफे के लिए छेड़ा गया था। उन्होंने लोगों की अगुवाई करते हुए 25 जून, 1975 को रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शन किया और आह्वावान किया कि सरकार के अवैधानिक और अनैतिक आदेशों का पालन न करें। इसके साथ-ही-साथ राजनारायण, एक समाजवादी नेता ने इंदिरा गांधी के खिलाफ याचिका दायर की कि उन्होंने चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्तेमाल किया था।
- रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नांडिज के नेतृत्व में 1974 में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया, जिसमें बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तें शामिल थीं। सरकार ने इस हड़ताल को अवैधानिक करार दिया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना को तैनात कर दिया। ऐसे में 20 दिन के बाद हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।
- न्यायपालिका के साथ इस दौर में सरकार और शासक दल के गहरे मतभेद पैदा हुए, जिसमें सरकार या संसद द्वारा संवैधानिक मसलों पर हस्तक्षेप भी शामिल था। यह केशवानन्द भारती के केस में साबित हो गया था। जब न्यायपालिका ने घोषणा की कि संसद ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है। इसने संवैधानिक व्याख्याओं और राजनीतिक विचारधाराओं को बहुत तेजी से सम्मिलित कर दिया था |
- राजनारायण की याचिका के उत्तर में, 25 जून, 1975 के दिन सरकार ने प्रधानमंत्री की सलाह पर 'आपातकाल' की घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क से साथ देश में कानून व व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया। ,
- 1975 की आपातकाल की घोषणा के दूरगामी परिणाम हुए और इसने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया, जैसे-
- इसने नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रभाव डाला, जिसके अंतर्गत बड़े पैमाने पर लोगों को गिरफ्तार किया गया, इसके साथ ही नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार भी छीन लिए गए।
- इसने कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य रिश्तों को भी प्रभावित किया तथा संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से नए परिवर्तन किए गए, जैसे विधायिका का कार्यकाल, आपातकाल के समय चुनावों को एक साल तक के लिए स्थगित किया जा सकता है।
- इसने मीडिया को भी प्रभावित किया, जैसे-प्रेस सेंसरशिप।
- आपातकालीन स्थिति के बाद इस बात पर प्रश्न और विवाद उठ खड़े हुए कि आपातकाल जरूरी था या नहीं? सरकार ने पक्ष रखा कि विपक्षी दल को चुने हुए शासक दल को अपनी नीतियों के अनुसार शासन करने देना चाहिए, जबकि आलोचकों ने कहा कि लोगों को सरकार के विरोध में धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार होना चाहिए।
- मई 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने जे०सी० शाह की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया, जिसका काम आपातकाल के दौरान की गई कार्रवाई व सत्ता के दुरुपयोग, अतिचार और कदाचार के विभिन्न आरोपों के विविध पहलुओं की जाँच करना था। इस आयोग ने पाया कि आपातकाल के नाम पर शक्तियों का दुरुपयोग किया गया अर्थात् निवारक नजरबंदी कानून के अंतर्गत बहुत सारी गिरफ्तारियाँ की गई, प्रेस पर गैरकानूनी पाबंदी लगाई गई तथा रात 2 बजे प्रेस की बिजली आपूर्ति काटने के लिए गैरकानूनी मौखिक आदेश दिए गए।
- आपातकाल ने बहुत सारे सबक सिखाए; प्रथम, भारत से लोकतंत्र को बिदा कर पाना बहुत कठिन है; दूसरा, आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को लिखित में दे; तीसरे, आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हुआ।
- जैसे ही आपातकाल खत्म हुआ, 1977 में चुनावों की घोषणा हुई जो एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत संग्रह था। इस प्रकार, आपातकाल के बाद राजनीति में दो बड़े विकास हुए-
- 1977 के चुनावों में लोगों के जनमत पर आपातकाल के एवज में कांग्रेस की हार हुई और विपक्ष ने 'लोकतंत्र बचाओ' के नारे के आधार पर चुनाव लड़ा।
- 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए, क्योंकि जनता पार्टी में निर्देशन, नेतृत्व और एक साझे कार्यक्रम का अभाव था तथा साथ ही जनता पार्टी कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं कर सकी।
- 1975 में आपातकाल की विरासत जीवन व राजनीति के हर क्षेत्र में महसूस की गई थी।आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपातकाल के मूल में था।
आर्थिक सन्दर्भ:-
- 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ नारे के बावजूद देश में गरीबी बरकरार।
- बांग्लादेश संकट से अर्थव्यवस्था चरमराई तथा यूएसए ने सहायता बन्द की।
- औद्योगिक विकास दर गिरती गई
- महंगाई व बेरोजगारी बढ़ी
- सरकारी कर्मचारियों के वेतन को रोक दिया गया।
- 1972-73 में मानसून असफल रहने से कृषि पैदावार कम हुई।
राजनीतिक सन्दर्भ:-
छात्र आन्दोलन-
छात्र आन्दोलन-
- गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतें तथा उच्च पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनवरी 1974 में आदोलन शुरू किया।
- मार्च 1974 में बढ़ती हुई कीमतों, खाद्यान्न के अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार में छात्रों ने आदोलन शुरू कर दिया।
- जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने इस आंदोलन का नेतृत्व दो शर्तों पर स्वीकार किया।
- आंदोलन अहिंसक रहेगा।
- यह बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, अतिपु राष्ट्रव्यापी होगा।
- जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति द्वारा सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की बात की थी।
- जेपी ने भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशालिस्ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेसी दलों के समर्थन से 'संसद-मार्च' का नेतृत्व किया था।
- इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन को अपने प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित बताया था।
नक्सलवादी आन्दोलन:-
- इसी अवधि में संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता बढ़ी।
- इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीपादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए हथियार और राज्य विरोधी तरीकों का सहारा लिया।
- 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवादी इलाके के किसानों ने हिसंक विद्रोह किया था, जिसे नक्सलवादी आंदोलन के रूप में जाना जाता है।
- 1969 में चारू मजूमदार के नेतृत्व में सी पी आई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पार्टी का गठन किया गया। इस पार्टी ने क्रांति के लिए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनायी।
- नक्सलियों ने धनी भूस्वामियों से बलपूर्वक जमीन छीनकर गरीब और भूमिहीन लोंगों को दी।
- वर्तमान में 9 राज्यों के 100 से अधिक पिछड़े आदिवासी जिलों में नक्सलवादी हिंसा जारी है।
इनकी माँगे निम्नलिखित हैं:-- इन इलाकों के लोगो को उपज में हिस्सा, पट्टे की सुनिश्चित अवधि और उचित मजदूरी जैसे बुनियादी हक दिये जाए।
- जबरन मजदूरी, बाहरी लोगों द्वारा संसाधनों का दोहन तथा सूदखोरों द्वारा शोषण से इन लोगों को मुक्ति मिलनी चाहिए।
रेल हड़ताल:-
- जार्ज फर्नाडिस के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय समिति ने रेलवे कर्मचारियों की सेवा तथा बोनस आदि से जुड़ी माँगो को लेकर 1974 में हड़ताल की थी।
- सरकार मे हड़ताल को असंवैधानिक घोषित किया और उनकी माँगे स्वीकार नहीं की।
- इससे मजदूरों, रेलवे कर्मचारियों, आम आदमी और व्यापारियों में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा हुआ।
न्यायपालिका को संघर्ष:-
- सरकार के मौलिक अधिकारों में कटौती, संपत्ति के अधिकार में कॉट-छाँट और नीति-निर्देशक सिद्धांतो को मौलिक अधिकारों पर ज्यादा शक्ति देना जैसे प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया।
- सरकार ने जे:एम. शैलट, के.एस. हेगड़े तथा ए.एन. ग्रोवर की वरिष्ठता की अनदेखी करके ए.एन.रे. को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करवाया।
- सरकार के इन कार्यों से प्रतिबद्ध न्यायपालिका तथा नौकरशाही की बातें होने लगी थी।
प्रशासनिक सन्दर्भ:-
- रेल कर्मचारियों ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में बोनस व सेवा शर्तो के लिए हड़ताल की।
- रामलील मैदान - 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने सेना पुलिस व सरकारी कर्मचारियों से सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करने का आहृवान किया।
- विपक्षी दलों ने जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग की।
आपातकाल की घोषणा:-
- 12 जून 1975 की इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
- 24 जून 1975 को सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर स्थगनादेश सुनाते हुए, कहा कि अपील का निर्णय आने तक इंदिरा गांधी सांसद बनी रहेगी परन्तु मंत्रिमंडल की बैठकों में भाग नहीं लेगी।
- 25 जून 1975 को जेपी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के इस्तीफे की माँग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की। इंदिरा गांधी के इस्तीफे की माँग की।
- जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से आग्रह किया वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें।
- 25 जून 1975 की मध्यरात्रि में प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 352 (आंतरिक गडबडी होने पर) के तहत राष्ट्रपति से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की।
आपातकाल को परिणामः-
- विपक्षी नेताओं की जेल में डाल दिया गया।
- प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गयी।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध।
- धरना, प्रदर्शन और हड़ताल पर रोक।
- नागरिकों के मौलिक अधिकार निष्प्रभावी कर दिये गये।
- सरकार ने निवारक नजरबंदी कानून के द्वारा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
- इंडियन एक्प्रेस और स्टेट्स मैन अखबारों को जिन समाचारों को छापने से रोका जाता था, वे उनकी खाली जगह में छोड़ देते थे।
- ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम' जैसी पत्रिकाओं ने प्रकाशन बंद कर दिया था।
- कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत तथा हिन्दी लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने आपातकाल के विरोध में अपनी पदवी सरकार को लौटा दी।
- 42 वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा अनेक परिवर्तन किए गये जैसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती न दे पाना तथा विधायिका के कार्यकाल को 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर देना आदि।
आपालकाला पर बहस:-
पक्ष:-
पक्ष:-
- बार-बार धरना प्रदर्शन और सामूहिक कार्यवाही से लोकतंत्र बाधित होता है।
- विरोधियों द्वारा गैर-संसदीय राजनीति का सहारा लेना।
- सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रमों में अड़चन पैदा करना।
- भारत की एकता के विरूद्र अंतराष्ट्रीय साजिश रचना।
- इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करने के कदम का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने समर्थन दिया।
विपक्ष:
- लोकतंत्र में जनता की सरकार का विरोध करने का अधिकार होता है।
- विरोध- आंदोलन ज्यादातर समय अहिंसक और शांतिपूर्ण रहें।
- गृह मंत्रालय ने उस समय कानून व्यवस्था की चिंता जाहिर नहीं की।
- संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग निजी स्वार्थ हेतु किया गया।
आपातकाल के दौरान किए गए कार्य:-
- आपातकाल के दौरान किए गए कार्य बीस सूत्री कार्यक्रम में भूमि सुधार, भू-पुनर्वितरण, खेतिहर मजदूरों के पारिश्रमिक पर पुनः विचार, प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी, बंधुआ मजदूरी की समाप्ति आदि जनता की भलाई के कार्य शामिल थे।
- विरोधियों को निवारक नज़र बड़ी कानून के तहत बंदी बनाया गया।
- मौखिक आदेश से अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई।
- दिल्ली में झुग्गी बस्तियों को हटाने तथा जबरन नसबंदी जैसे कार्य किये गये।
आपातकाल की सबक:-
- आपातकाल के दौरान भारतीय लोकतंत्र की ताकत और कमजोरियाँ उजागर हो गई थी, लेकिन जल्द ही कामकाज लोकतंत्र की राह पर लौट आया। इस प्रकार भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।
- आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई है तथा इन अधिकारों की रक्षा के लिए कई संगठन अस्तित्व में आये है।
- संविधान के आपातकाल के प्रावधान में 'आतरिक अशान्ति' शब्द के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह' शब्द को जोड़ा गया है। इसके साथ ही आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिपरिषद् राष्ट्रपति को लिखित में देगी।
- आपातकाल में शासक दल ने पुलिस तथा प्रशासन को अपना राजनीतिक औजार बनाकर इस्तेमाल किया था। ये संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाई थी।
आपातकाल के बाद की राजनीति
- जनवारी 1977 में विपक्षी पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया।
- कांग्रेसी नेता बाबू जगजीवन राम ने "कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी" दल का गठन किया, जो बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गया।
- जनता पार्टी ने आपातकाल की ज्यादतियों को मुद्दा बनाकर चुनावों को उस पर जनमत संग्रह का रूप दिया।
- 1977 के चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा में 154 सीटें तथा जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 330 सीटे मिली।
- आपातकाल का प्रभाव उत्तर भारत में अधिक होने के कारण 1977 के चुनाव में कांग्रेस को उत्तर भारत में ना के बराबर सीटें प्राप्त हुई।
- जनता पार्टी की सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री तथा चरण सिंह व जगजीवनराम दो उपप्रधानमंत्री बने।
- जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व व एक साझे कार्यक्रम के अभाव में यह सरकार जल्दी ही गिर गई।
- 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 353 सीटें हासिल करके विरोधियों की करारी शिकस्त दी।
शाह आयोग :-
- आपातकाल की जाँच के लिए जनता पार्टी की सरकार द्वारा मई 1977 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. सी. शाह की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग की नियुक्ति की गई।
शाह आयोग द्वारा एकत्र किए गए प्रामाणिक तथ्य:-
- आपातकाल की घोषणा का निर्णय केवल प्रधानमंत्री का था।
- सामाचार पत्रों के कार्यालयों की बिजली बंद करना पूर्णतः अनुचित था।
- प्रधानमंत्री के निर्देश पर अनेक विपक्षी राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी।
- मीसा (MISA) का दुरुपयोग किया गया था।
- कुछ लोगों ने अधिकारिक पद पर न होते हुए भी सरकारी काम-काज में हस्तक्षेप किया था।
नागरिक स्वतत्रता संगठनों का उदय-
- नागरिक स्वतंत्रता एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का उदय अक्टूबर, 1976 में हुआ।
- इन संगठनों ने न केवल आपातकाल बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहने के लिए कहा है।
- 1980 में नागरिक स्वतंत्रता एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का नाम बदलकर ‘नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए लोगों का संघ' रख दिया गया।
- गरीबी सहभागिता, लोकतन्त्रीकरण तथा निष्पक्षता से सम्बन्धित चिन्ताओं के सन्दर्भ में भारतीय नागरिक स्वतंत्रता संगठनों (CLOS) ने अनेक क्षेत्रों में संगठित होकर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया है।
जनता पार्टी सरकार का शासन:-
- दिशाहीन, कलहपूर्ण, कमजोर नेतृत्व एवं अव्यवस्थित शासन का शिकार
- जनता पार्टी की सरकार 18 महीनें में गिर गई
- 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए जिसमें इन्दिरा गांधी (कांग्रेस-I) भारी बहुमत से जीती।