संघवाद - पुनरावृति नोट्स

CBSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान
पाठ - 7 संघवाद
पुनरावृति नोटस

स्मरणीय बिन्दु:-
  • ऐतिहासिक दृष्टिकोण:- भारत में संघवाद इसकी संवैधानिक विकास की प्रक्रिया की उपज है। जिसने एक केन्द्रीभूत राज्य व्यवस्था का धीरे-धीरे विकेन्द्रित व्यवस्था में परिवर्तन कर दिया। भारत में संघवाद का सूत्रपात सन् 1861 में होता है।
  • अंग्रेज़ों को भय था कि भारत में साम्राज्यवादी हित उसी समय तक सुरक्षित रह पायेगें जब तक कि केन्द्रीय व्यवस्था मजबूत होगी। इस प्रकार एक शक्तिशाली केन्द्र प्रधान संघ की परंपरा 1935 के अधिनियम के माध्यम से संविधान निर्मात्री सभा तक पहुँची जिसने उसे स्वीकार कर लिया। उसके इस विचार को देश के विभाजन ने और भी अधिक प्रांसगिक बना दिया। देशी रियासतों, भाषाई भिन्नता, संविधान की सर्वोच्चता।
  • भारतीय संघात्मक सरकार में 28 राज्य व 7 केन्द्र प्रशासित इकाइयों मिलकर भारत में संघीय शासन की स्थापना करती है। दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया है।
  • अमेरिका भी संघीय राज्य है लेकिन वह जर्मनी व भारतीय संघवाद से भिन्न है।
  • संघवाद की मूल अवधारणा:- यह संस्थागत प्रणाली हैं। इसमें एक प्रांतीय स्तर सरकार और दूसरी केन्द्रीय स्तर की सरकार होती है। संघीय देशों में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था है।
  • दोहरे शासन की रूपरेखा लिखित संविधान में मौजूद होती है।
  • संविधान सर्वोच्च होता है। और दोनों सरकारों का स्रोत भी।
  • राष्ट्रीय महत्व के विषयों जैसे प्रतिरक्षा और मुद्रा का उत्तरदायित्व संघीय या केन्द्रीय सरकार का होता है।
  • क्षेत्रीय या स्थानीय महत्व के विषयों पर प्रान्तीय राज्य सरकारे जवाबदेह होती है।
संघवाद का अर्थ:-
  • साधारण शब्दों में कहें तो संघवाद संगठित रहने का विचार है। (संघ=संगठन+वाद=विचार) |
  • ‘संघवाद' एक संस्थागत प्रणाली है जिसमें दो स्तर की राजनीतिक व्यवस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है, इसमें एक संधीय (केन्द्रीय) स्तर की सरकार और दूसरी प्रांतीय (राज्यीय) स्तर की सरकारें।
  • संघीय (केन्द्रीय) सरकार पूरे देश के लिए होती है, जिसके जिम्मे राष्ट्रीय महत्व के विषय होते है और राज्य की सरकारें अपने प्रांत (राज्य) विशेष के लिए होती है, जिसके जिम्में राज्य के महत्व के विषय होते हैं। उदाहरण-भारत में संघ सूची के विषयों पर केन्द्रीय (संघीय) सरकार कानून बनाती है तो राज्य सूची के विषय पर राज्य सरकार कानून बनाती है।
भारतीय संविधान में संघवाद:-
  • संविधान के अनुच्छेद-1 में भारत को 'राज्यों का संघ' कहा गया है।
  • भारत में जो संघवाद अपनाया गया है, उसका आधार राष्ट्रीय आन्दोलनन के दौरान आन्दोलन कर्ताओं के द्वारा लिए उस फैसले का परिणाम है कि जब देश आजाद होगा तब विशाल भारत देश पर शासन करने के लिए शक्तियों को प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बीच बांटेगे | आज संविधान में ऐसा ही है।
  • भारतीय संविधान में संघीय व्यवस्था (संघवाद) के अनुसार- एक संघीय (केन्द्रीय) सरकार + उन्नतीस (29) राज्य तथा सात (07) केन्द्र शासित सरकारें अपने-अपने प्रांतों में अपने-अपने विषयों पर काम करती है। सात केन्द्र शासित प्रांतों में से दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया है।
  • वेस्टइंडीज, नाईजीरिया, अमेरिका एवं जर्मनी जैसे देशों में भी 'संघवाद' है परन्तु भारतीय संघवाद से भिन्न।
भारतीय संघवाद की विशेषताएं:-
  1. भारत में दो स्तर (केन्द्रीय स्तर तथा राज्य स्तर) की सरकारें है।
  2. लिखित संविधान।
  3. शक्तियों का विभाजन (संघ सूची-97), राज्य सूची (66), समवर्ती सूची (47) + अवशिष्ट शक्तियों
  4. स्वतंत्र न्यायपालिका।
  5. संविधान की सर्वोच्चता।
शक्ति विभाजन:- भारतीय संविधान में दो तरह की सरकारों की बात मानी गई है- एक संघीय (केन्द्रीय) सरकार तथा दूसरी प्रांतीय (राज्य) सरकार। संविधान के अनुच्छेद 245-255 में संघ तथा राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण का घोषणा पत्र है। संघीय (केन्द्रीय) सरकार के पास राष्ट्रीय महत्व के तो प्रांतीय (राज्य) सरकार के पास प्रांतीय महत्व के विषय हैं।
भारतीय संविधान में संघात्मक लक्षण:-
  1. संविधान की सर्वोच्चता:- भारत में कोई भी शक्ति संविधान के ऊपर नही है।
  2. शक्तियों का विभाजन:- शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों के आधार पर किया गया है वे है संघ सूची, राज्य सूची व समवर्ती सूची, संघ सूची 97, राज्य सूची 67 तथा समवर्ती सूची में 47 विषय है।
  3. स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायलय
  4. संशोधन प्रणाली:- यह संघीय प्रक्रिया के अनुरूप है।
  5. तीन स्तर की सरकारें:- केंद्र, राज्य एवं स्थानीय |
भारतीय संविधान में एकात्मकता के लक्षण:-
  • इकहरी नागरिकता
  • शक्ति विभाजन में संघीय (केन्द्रीय) पक्ष अन्य से अधिक ताकतवर |
  • संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान |
  • केन्द्रीय सरकार राज्यों की सीमाओं नाम से परिवर्तन कर सकती है।
  • एकीकृत न्यायपालिका
  • आपातकाल में एकात्मक शासन
  • आय के प्रमुख संसाधनों पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण राज्य अनुदानों और वित्तीय सहायता के लिए केन्द्र पर राज्य अनुदानों और वित्तीय सहायता के लिए केन्द्र पर आश्रित, योजना आयोग राज्यों के संसाधन-प्रबंध की निगरानी करता है। केन्द्र सरकार अपने विशेषाधिकार के आधार पर राज्यों को अनुदान व ऋण देती है।
  • राज्यों में राज्यपाल नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।
  • इकहरी प्रशासकीय व्यवस्था (अखिल भारतीय सेवाएं-IAS)
  • प्रशासकीय व्यवस्था इकहरी है। अखिल भारतीय सेवाएं पूरे देश के लिए है और इनमें चयनित पदाधिकारी राज्यों के प्रशासन में कार्य करते हैं जैसे जिला- कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर इन सभी पर केन्द्र सकार का नियंत्रण होता है राज्य इनके विरूद्ध अनुशासन कार्यवाही कर सकता है न ही हटा सकता है।
  • देश के किसी क्षेत्र में ‘सैनिक शासन’ लागू हो तो संसद केा इस बात का अधिकार देते है की ऐसी स्थिति में केन्द्र या राज्य के किसी अधिकारी के द्वारा शांति व्यवस्था बनाए रखने या बहाली पर कानून जायज करार दे सके। इसी के अन्तर्गत सशस्त्र बल विशिष्ट शक्ति अधिनियम बनाया गया।
संघ में सशक्त केन्द्रीय सरकार क्यों?-
  • भारतीय संविधान द्वारा एक शक्तिशाली (सशक्त) केन्द्रीय (संघीय) सरकार की स्थापना करने कारण निम्न है-
  • भारत एक महाद्वीप की तरह विशाल तथा अनेकानेक विविधताओं और सामजिक-आर्थिक समस्याओं से भरा है। संविधान निर्माता शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के माध्यम से उन विविधताओं तथा समस्याओं का निपटारा चाहते थे। देश की आजादी (1947) के समय 500 से अधिक देशी रियासते थी उन सभी को शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के द्वारा ही भारतीय संघ में शमिल किया जा सका।
भारतीय संघीय व्यवस्था में तनाव:-
केन्द्र-राज्य-संबंध - राज्यों के गठन की मांग, वित्तीय अनुदान की मांग, केन्द्र द्वारा सामाजिक आर्थिक
विकास की नीतियां, स्वायतता की मांग का मसला राजनैतिक रूप से सरगर्म हुआ है।
1. स्वायत्तता की मांग:- समय -समय पर अनेक राज्यों और राजनीतिक दलों में राज्यों को केन्द्र के मुकाबले ज्यादा स्वायतता देने की मांग उठाई हे जो निम्न रूपों में है-
  • वित्तीय स्वायत्तता- राज्यों के आय के अधिक साधन होने चाहिए तथा संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण।
  • प्रशासनिक स्वायत्तता- शक्ति विभाजन को राज्यों के पक्ष में बदला जाएं। राज्यों को अधिक  शक्तियां दी जाए।
  • सांस्कृतिक और भाषाई मुद्दे- तमिलनाडु में हिन्दी विरोध मे पंजाब में पंजाबी व संस्कृत के प्रोत्साहन की मांग।
  • शक्ति विभाजन को राज्यों के पक्ष में बदला जाए।
  • राज्यों के पास आय के स्वतंत्र साधन होने चाहिए। 1977 में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने केन्द्र राज्य संबंधों को पुनः परिभाषित करने की मांग के लिए दस्तावेज प्रकाशित किया था।
  • राज्य प्रशासनिक - तंत्र पर केन्द्रीय नियंत्रण से नाराजगी।
  • सांस्कृति व भाषाई मुद्दे - तमिलनाडु में हिन्दी विशेष पंजाब में पंजाबी व संस्कृति के प्रोत्साहन की मांग हिन्दी भाषी क्षेत्रों का अन्य क्षेत्रों पर वर्चस्व।
2. राज्यपाल की भूमिका तथा राष्ट्रपति शासन:-
  • राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • योग्यता - वह भारत का नागरिक हो, उसकी उम्र 35 वर्ष हो।
  • राज्य संसद अथवा किसी राज्य के विधान मंडल के किसी सदन का सदस्य नही होना चाहिए। तथा किसी लाभ के पद पर आसीन न हो।
3. केन्द्र राज्य संबंध (सरकारिया आयोग)
  • राज्य सरकार के कार्यो में हस्तक्षेप के रूप में राज्यपाल के द्वारा केन्द्र सरकार का दखल।
  • 1967 तक अनुच्छेद 356 का अत्यन्त सीमित प्रयोग किया।
  • अनुच्छेद 356 - जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो कि उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधो के अनुसार नही चलाया जा सकता।
  • केन्द्र में कांग्रेस व राज्य में गैर कांग्रेसी सरकार को राज्यपाल को माध्यम से उसे सत्तारूढ़ होने से रोका।
  • नवीन राज्यों की मांग
4. अन्तर्राज्यीय विवाद:-
  • स्वायत्ता व आय के स्रोतों पर हिस्सेदारी का प्रश्न
  • दो राज्यों के बीच विवाद - कानूनी विवाद को न्यायपालिका हल करती है। राजनीति पहलू में विचार-विमर्श, पारस्परिक व विश्वास को आधार पर हल निकाला जाता है।
  • राज्यों के बीच सीमा विवाद
  • नदियों के जल-बंटवारे को लेकर विवाद
5. विशिष्ट प्रावधान (जम्मू-कश्मीर)
  • जम्मू कश्मीर के 370 धारानुसार विशिष्ट स्थिति प्रदान की गई है।
  • अनुच्छेद 370 केन्द्र सूची और समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा कानून बनाने और उसे जम्मू कश्मीर में लागू करने के लिए इस राज्य की सहमति आवश्यक है।
  • यह अन्य राज्यों की स्थिति से भिन्न है।
  • एक अलग संविधान और ध्वज है।
  • राज्य सरकार की सहमति के बिना जम्मू कश्मीर में आतंरिक अशांति के आधार पर आपातकाल लागू नही किया जा सकता।
  • राज्य के नीति निदेशक लागू नहीं होते (368 धारा)
  • राज्य सरकार की सहमति से ही लागू हो सकते है। इन विशिष्ट प्रावधानों से लागू हो सकते है। इन विशिष्ट प्रावधानों से उन क्षेत्रों में अलगवादी प्रवृत्तियाँ मुखर हो सकती है। इन पर विवाद है।