उपभोक्ता संरक्षण-पुनरावृति नोट्स

                                                                                   CBSE कक्षा 12 व्यवसाय अध्ययन

(भाग-2) पाठ-12 उपभोक्ता संरक्षण
पुनरावृति नोट्स


उपभोक्ताओ को उत्पादकों एवं विक्रेताओं के अनुचित व्यवहारों से बचाना उपभोक्ता संरक्षण कहलाता है। इसके माध्यम से न केवल उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों के बारे में शिक्षित किया जाता है अपितु उनकी शिकायतों का निवारण भी किया जाता है। आमतौर पर ग्राहण निम्निलिखित तरीयों से शोषित किए जातें हैं : - (1) मिलावट (2) घटिया गुणवत्ता आदि।

  • उपभोक्ताओं के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण का महत्व
    1. उपभोक्ताओं की अज्ञानता:- अधिकांश उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों एवं उपलब्ध समाधानों का ज्ञान नहीं होने के कारण उनका शोषण किया जाता है अतः उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता है।
    2. असंगठित उपभोक्ता:- भारत में उपभोक्ता अभी भी असंगठित है तथा यहाँ उपभोक्ता संगठनों की कमी भी है जिसके कारण उपभोक्ता संरक्षण आवश्यक है।
    3. उपभोक्ताओं का व्यापक शोषण:- उपभोक्ताओं को बड़े स्तर पर अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है इसलिए उनका संरक्षण आवश्यक है।
  • व्यवसाय के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण का महत्त्व
    1. व्यवसाय का दीर्घ अवधिक हित:- वैश्वीकरण के पश्चात अब प्रतियोगिता विश्व स्तर की हो गई है। अतः व्यवसाय बाजार का बड़ा अंश केवल तभी जीता जा सकता है जब वे अपने उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपने उत्पाद का विकास करे।
    2. नैतिक औचित्य:- यह किसी भी व्यवसाय की नैतिक जिम्मेदारी होती है की वह उपभोक्ता के हितों की रक्षा करे तथा किसी भी प्रकार की गलत गतिविधियों, जैसे दोषपूर्ण तथा असुरक्षित उत्पाद, मिलावट, झूठ तथा धोखेबाज विज्ञापन इत्यादि से बचे।
    3. व्यवसाय समाज के संसाधनों का प्रयोग करता है:- प्रत्येक व्यवसाय द्वारा समाज के संसाधनों को प्रयोग किया जाता है, अतः यह उनका कर्त्तव्य हो जाता है की समाज के हित में कार्य करे।
    4. समाजिक उत्तरदायित्व:- व्यवसाय का विभिन्न समूहों जैसे स्वामियों, कर्मचारियों, सरकार, उपभोक्ताओं आदि के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व है। अतः उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर सही गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उपलब्ध की जानी चाहिए।
    5. सरकारी हस्तक्षेप:- यदि कोई व्यवसाय, अनुचित व्यापार व्यहार करता है, तो सरकार हस्तक्षेप करती है और व्यवसाय की ख्याति का नुकसान होता है।
  • उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986
    उपभोक्ता का अर्थ:- कोई भी व्यक्ति जो माल या सेवाएँ प्रतिफल के रूप में प्राप्त करता है या उनका प्रयोग करता है। लेकिन इसमें पुनः बिक्री या वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए प्राप्त माल या सेवाएँ शामिल नहीं है।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986
    उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ:- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ है।
    1. उपभोक्ताओं के विभिन्न अधिकारों को मान्यता देकर उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना।
    2. जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर त्रि-स्तरीय प्रवर्तन तंत्र की स्थापना करके उपभोक्ताओं की शिकायतों का आसान, तीव्र एवं मितव्ययी समाधान करना है।
  • उपभोक्ता के अधिकार:-
    उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपभोक्ताओं को छः अधिकार दिये गए है, जो निम्निलिखित है : -
    1. सुरक्षा का अधिकार:- इसका अभिप्राय है स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पादों तथा सेवाओं के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त करना। (उदाहरण आइएसआई चिन्ह वाले बिजली के उपकरणों का उपयोग) उपभोक्ता को ऐसी वस्तुओं तथा सेवाओं से सुरक्षा का अधिकार होता है जिनसे उसे कोई हानि हो सकती है।
    2. सूचना प्राप्त करने का अधिकार:- इसका अभिप्राय है उपभोक्ता का वस्तुओं एवं सेवाओं की गुणवत्ता आदि के संबंध में पूर्ण सूचना प्राप्त करना ताकि वह खरिदने से पूर्व ठीक निर्णय ले सके।
      उदाहरण के लिए:- उत्पाद की मात्रा, शुद्धता, प्रयोग में बढ़ती जाने वाली सावधानियाँ, पुनप्रयोग, संभावित जोखिम एव साइडफेक्ट।
    3. चुनाव / चयन का अधिकार:- उपभोक्ता को उपलब्ध वस्तुओं तथा सेवाओं में से अपनी इच्छानुसार चयन / चुनाव करने का अधिकार है। वह किसी भी संस्था द्वारा उत्पादित किसी भी किस्म की वस्तु पसंद कर सकता है। कोई भी व्यक्ति उसकी पसंद को अनुचित ढंग से प्रभावित करता है, यह उसके अधिकार में विघ्न माना जाता है।
    4. शिकायत का अधिकार:- उपभोक्ता को अधिकार है की वह वस्तुओं अथवा सेवाओं से अंसतुष्ट होने की स्थिति में उपयुक्त मंच के समक्ष शिकायत दर्ज कर सके।
    5. क्षतिपूर्ति का अधिकार:- उपभोक्ता को अधिकार है की यदि किसी वस्तु अथवा सेवा से उसे कोई हानि हुई है तो वह क्षतिपूर्ति / उपचार पा सकता है। इसके लिए सरकार द्वारा त्रि-स्तरीय प्रवर्तन तंत्र की स्थापना की गई है जो की जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करती है।
    6. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार:- उपभोक्ता को आजीवन भली प्रकार सूचना प्राप्त करने तथा जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। इसके माध्यम से उपभोक्ता जागरूक बना रहता है। उपभोक्ताओं को जन संचार माध्यमों से अधिकारों और उपलब्ध उपचारों से अवगत कराया जाना चाहिए। भारत सरकार ने विद्यालय शिक्षा पाठ्यक्रम में उपभोक्ता शिक्षा को शामिल किया है तथा मिडिया का सहारा भी ले रही है। उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकरी देने के लिए।
  • उपभोक्ताओं के दायित्व / जिम्मेदारी:-
    1. उपभोक्ता को अपने अधिकारों का उपयोग करना चाहिए:- उपभोक्ता को बाजार से क्रय की गई वस्तुओं अथवा सेवाओं के संबंध में अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए ताकि उनका प्रयोग किया जा सके।
    2. उपभोक्ता को सावधान उपभोक्ता होना चाहिए:- उत्पाद अथवा सेवाएँ क्रय करते समय उपभोक्ता को सदैव जागरूक रहना चाहिए ताकि शोषण से बचा जा सके।
    3. उपभोक्ता को शिकायत अवश्य दर्ज करवानी चाहिए:- प्राप्त की गई किसी वस्तु अथवा सेवा में कमी निकलने पर उपभोक्ता को उपयुक्त फोरम में अपनी शिकायत अवश्य दर्ज करवानी चाहिए।
    4. केश-मेमो लेना चाहिए:- उपभोक्ता को कैश मीमो पर जोर देना चाहिए जो कि क्रय का सबूत होती है, जिससे बाद में शिकायत हो सकेऔर हर्जाना मिल सके।
    5. उपभोक्ता को गुणवत्ता जागरूक होना चाहिए:- उपभोक्ता को केवल मानक वस्तुएँ ही खरीदनी चाहिए जैसे बिजली के उपकरण पर आईएसआई चिन्ह, खाद्य उत्पादों पर एफपीओ तथा गहनों पर हालमार्क का चिन्ह आदि देखकर ही खरीदना चाहिए। यानि की उसे वस्तु की गुणवत्ता के संबंध में सदैव जागरूक रहना चाहिए।

    6. विज्ञापन विंसगतियों की जानकारी:- उपभोक्ता को विज्ञापन सम्बन्धित विंसगतियों को प्रयोजक की जानकारी में लाना चाहिए और उसे बन्द करवाना चाहिए।
    7. अपने कानूनी अधिकारों का प्रयोग करना:- यदि निर्माता या क्रेता द्वारा उपभोक्ता के किसी अधिकार का उल्लंघन किया जाता हो तो उपभोक्ता को उपभोक्ता संरक्षण अधिकनियम 1986 के अंतर्गत गठित कानूनी तंत्र में अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
  • उपभोक्ता संरक्षपण अधिनियम, 1986 की निशेषता और प्रावधान:-
  • शिकायत कोन दर्ज करवा सकता है?
    उचित उपभोक्ता फोरम में शिकायत निम्नांकित द्वारा की जा सकती है:-
    1. किस उपभोक्ता द्वारा
    2. किसी पंजीकृत उपभोक्ता संघ द्वारा
    3. केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार द्वारा
    4. एक जैसे हित वाले कई उपभोक्ताओं की ओर से एक अधिक उपभोक्ताओं द्वारा
    5. मृत उपभोक्ता के कानूनी प्रतिनिधि द्वारा
  • किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है?
    उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986, हर बड़े, छोटे, निजी या सार्वजनिक उपक्रमों, सहकारी क्षेत्र निर्माता, व्यापारी थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता, माल की सेवाएँ, सभी पर लागू होता है।
  • निम्नलिखित के लिखाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है:-
    1. किसी दोषपूर्ण माल के बिक्रेता या निमार्ता:-
      दोष:- 
      माल की शुद्धता, मात्रा या गुणवत्ता में कमी दोष कहलाती है।
    2. ऐसा आपूर्तिकर्ता जिसकी सेवाओं में किसी भी रूप में कमी हो:-
      कमी:-
       सेवाओं में अपूर्णता, गुणवत्ता, सेवाओं, की प्रकृति अथवा प्रदर्शन में कमी।
      उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 कमी को निम्न रूप में परिभाषित करती है। "कोई गलती, दोष, कमी, गुणवत्ता, प्रकृति या प्रदर्शन में उपर्यापत्तता"। सेवा वह है जो आपूर्तिकर्ता द्वारा निःशुल्क नहीं प्रदान की गई। किसी बैंक द्वारा उदाहरण के लिए एक चैक बुक करने में देरी, चैक के नकदीकरण में देरी।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत उपचार एजेनसियाँ:-
    उपभोक्ता की शिकायतों का समाधान कराने हेतु उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक त्रिस्तरीय तंत्र की स्थापना सरकार द्वारा की गई:-
    DIrect Appealराष्ट्रीय आयोग
      
    Direct Appealराज्य आयोग
      
    Direct Appealजिला मंच
  • उपचार ऐजेंसियाँ
     जिला मंचराज्य अयोगराष्ट्रीय आयोग
    स्थापनाराज्य सरकार द्वाराराज्य सरकार द्वाराकेंद्रीय राज्य सरकार द्वारा
    सदस्यअध्यक्ष=1
    अन्य सदस्य=02
    (जिनमे से कम से कम एक महिला)
    अध्यक्ष=1
    अन्य सदस्य=02
    (जिनमे से कम से कम एक महिला)
    अध्यक्ष=1
    अन्य सदस्य=02
    अन्य सदस्य= कम से (जिनमे से कम से कम एक महिला)
    मूल्य तथा मुआवजा20 लाख रूपये तक20 लाख रूपये से ज्यादा और एक करोड़ तकएक करोड़ से ज्यादा
    शिकायत हैडल करने की प्रक्रियाशिकायत प्राप्ति विरोधी पक्ष को सूचना माल को प्रयोशाला भेजना यदि माल दोषपूर्ण है तो शिकायत करने वाले को उचित उपचार जैसे:- हर्जाना देना, दोष दूर करना आदि।जैसा की जिला मंच जिला मंच परजैसा की जिला मंच पर जिला मंच पर
    निर्णय के विरुद्ध अपीलनिर्णय के 30 दिनों में राज्य आयोग मेंनिर्णय के 30 दिनों राष्ट्रीय आयोग मेंनिर्णय के 30 दिनों सर्वोच्च न्यायालय में
    नोट:- सर्वोच्य न्यायालय तक केवल वही मुकद्दमा जा सकता है जिसको सीधा राज्य या राष्ट्रीय आयोग में दर्ज किया गया है। जिला मंच पर दर्ज मुकद्दमा, राष्ट्रीय आयोग तक ख़त्म हो जाता है।
  • उपभोक्ता संरक्षण कानून का सीमा क्षेत्र”
    यह कानून सभी वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है केवल वाणिज्यिक उद्देश्यों को छोड़कर, चाहे वे निजी, पब्लिक था सहकारी क्षेत्र द्वारा उपलब्ध करवाई गई हो। इसके अन्तर्गत जन उपयोगी सेवाएँ भी शामिल है। इस कानून के तहत कोई भी अन्तः उपभोक्ता, पंजीकृत उपभोक्ता संघ, राज्य या केंद्रीय सरकार शिकायत दर्ज करवा सकता है। शिकायत व्यक्तिगत रूप से या डाक द्वारा दर्ज करवाई जा सकती है। शिकायत दर्ज करवाने की कोई फीस नहीं है।
    शिकायत माल में दोष या सेवाओं में कमी से सम्बंधित हो सकती है यह कीमत विभेद या अनुचित व्यापर व्यवहार से भी सम्बंधित हो सकती है।
  • उपभोक्ता को उपलब्ध उपचार:-
    1. वस्तु अथवा सेवा की कमी को ठीक करना।
    2. खराब वस्तु को बदल कर नई ठीक/सही वस्तु उपलब्ध करना।
    3. उत्पाद के लिए दिए गए मूल्य को वापस करना।
    4. उपभोक्ता को खराब वस्तु/सेवा से होना वाली हानि की क्षतिपूर्ति करना।
    5. अनुचित व्यापारिक व्यवहार को रोकना तथा उसकी पुनरावृत्ति न करना।
    6. खराब तथा खतरनाक वस्तुओ की बिक्री पर रोक लगाना।
    7. उपभोक्ता कल्याण कोष अथवा किसी व्यक्ति के पास धनराशि (घटिया माल के मूल्यों से 5 प्रतिशत से कम नहीं) जमा करना।
    8. सुधार करके विज्ञापन को प्रस्तुत करना, ताकि विज्ञापन के प्रभाव को खत्म किया जा सके।
  • कुछ महत्वपूर्ण उपभोक्ता संरक्षण संघों व गैर-सरकारी संगठन, जो उपभोक्ता संरक्षण कर रहे है:-
    1. उपभोक्ता समन्वय परिषद, दिल्ली।
    2. कॉमन कॉज दिल्ली।
    3. उपभोक्ता शिक्षा के हित में ऐच्छिक संगठन, दिल्ली।
    4. मुम्बई ग्राहक पंचायत
    5. उपभोक्ता संघ, कोलकता
    6. उपभोक्ता एकता एंव प्रन्यास समिति, जयपुर
  • इन उपभोक्ता संगठनों एंव गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किये जाने वाले प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:-
    1. प्रशिक्षण कार्यक्रम, सेमिनार तथा कार्यशाला आयोजित करके आम जनता को उपभोक्ता अधिकारों के सम्बन्ध में शिक्षा देना।
    2. इस सम्बन्ध में प्रकाशन तथा पत्रिकाएँ जारी करना ताकि उपभोक्ता को जागरूक किया जा सके।
    3. उपयुक्त उपभोक्ता न्यायालय में उपभोक्ता की ओर से शिकायत दर्ज करना।
    4. निकृष्ट, मिलावटी पदार्थों इत्यादि के खिलाफ जागरूकता फैलाने के उदेश्य से, प्रदर्शनी आयोजित करना।
    5. उपभोक्ताओ को क़ानूनी सहयता तथा उपचार कराने हेतु सहयता देना।
    6. शोषणकारी एंव अनुचित व्यवहारों का सामना करने के लिए उपभोक्ताओ को प्रेरित करना।
    7. खाद्य पदार्थो में मिलावट, दवाओं के दुरूपयोग के सम्बन्ध में फिल्म केसैट तैयार करना।
  • उपभोक्ता संरक्षा तरीके एंव साधन
    • सरकार:- सरकार विभिन्न प्रावधान बनाकर उपभोक्ताओं का हित संरक्षित करती है। जैसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 वस्तु विक्रय अधिनियम, 1930 भारती मानक अधिनयम ब्यूरो 1986 आदि उपभोक्ता शिकायत पर हर्जाना दिलवाने का त्रिपक्षीय तंत्र है।
    • उपभोक्ता संगठनः- ये संगठन व्यवसायों पर दवाब बना सकते है कि गलत क्रियाविधियों तथा उपभोक्ताओं के शोषण से दूर रहे। उदाहरण:-
      1. उपभोक्ता समन्वय परिषद, दिल्ली।
      2. सामान्य संघ दिल्ली
      3. उपभोक्ता संघ कोलकाता
      4. मुंबई ग्राहक पंचायत, मुंबई आदि।
    • व्यव्साहिक संगठनः- व्यापर, वाणिज्य एंव कारोबार का संघ जैसे भारतीय वाणिज्य मंडल का महासंघ तथा भारतीय उद्यम परिसंघ ने अपने सदस्यों के लिए ग्राहकों से व्यवहार करने के लिए आचार संहिता लागू की है।