न्यायपालिका - एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर
सीबीएसई कक्षा - 11 राजनीति विज्ञान
एनसीईआरटी प्रश्नोत्तर
पाठ - 6 न्यायपालिका
एनसीईआरटी प्रश्नोत्तर
पाठ - 6 न्यायपालिका
1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके कौन-कौन से हैं? निम्नलिखित में जो बेमेल हो, उसे छाँटें-
- सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है।
- न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जा सकता है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
- न्यायाधीश की नियुक्ति में संसद की दखल नहीं हैं।
उत्तर- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके इस प्रकार से हैं :
- सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह की जाती है।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद की भूमिका न होने के कारण न्यायपालिका को व्यवस्थापिका से स्वतंत्र रखा गया है।
- यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण तरीके हैं। लंबी कार्यावधि उसकी स्वतंत्रता में सहायक है।
- न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जा सकता है।
इस प्रश्न के अंतर्गत दिए गए चार बिंदू में तीसरा बिंदू 3. बेमेल हैं जो इस प्रकार है : उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालयस में नहीं किया जा सकता है।
2. क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर- एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका का होना अत्यंत आवश्यक है। भारत के संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए अनेक प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन उसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। इसे भी विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है। यदि न्यायपालिका अपनी सीमा के आधिक्य में कार्य करती है, तो विधायिका विधि अथवा संविधान में संशोधन करके न्यायपालिका के कार्य का परिसीमन कर सकती है। इसकी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि यह बिना किसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक हस्तक्षेप के प्रत्येक विवाद पर निर्भय होकर अपना निर्णय दे।
उत्तर- एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका का होना अत्यंत आवश्यक है। भारत के संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए अनेक प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन उसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। इसे भी विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है। यदि न्यायपालिका अपनी सीमा के आधिक्य में कार्य करती है, तो विधायिका विधि अथवा संविधान में संशोधन करके न्यायपालिका के कार्य का परिसीमन कर सकती है। इसकी स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि यह बिना किसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक हस्तक्षेप के प्रत्येक विवाद पर निर्भय होकर अपना निर्णय दे।
3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान कौन-कौन से हैं?
उत्तर- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान इस प्रकार है :
उत्तर- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान इस प्रकार है :
- न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में प्रावधान- न्यायाधीशों की नियुक्ति के अधिकार राष्ट्रपति को दिए गए हैं। इस संबंध में राष्ट्रपति जरूरत पड़ने पर मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से परामर्श ले सकता है।
- सेवानिवृत्त्ति के पश्चात् वकालत करने पर प्रतिबंध- भारतीय संविधान सेवा निवृत्त्त होने के बाद न्यायाधीश को भारत के किसी भी क्षेत्र में वकालत करने की अनुमति नहीं देता है।
- कार्यप्रणाली के संबंध में प्रावधान- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए उसके कार्यप्रणाली के नियमन हेतु नियम बनाने का अधिकार भी स्वयं न्यायपालिका का है। लेकिन शर्त यह है कि नियम संसद द्वारा निर्मित विधि के अंतर्गत होना चाहिए तथा इस पर राष्ट्रपति का अनुमोदन भी आवश्यक है।
- पद की सुरक्षा के संबंध में प्रावधान- न्यायाधीशों के पद सुनिश्चित किये गए है कि इन्हें कोई भी पद से हटा नहीं सकता। यदि कदाचार और अयोग्यता के आधार पर हटाया भी जा सकता है तो उससे पूर्व उस आशय का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। इस प्रकार उनको पद से हटाने की प्रक्रिया को बहुत जटिल बनाया गया है।
- पर्याप्त वेतन एवं भत्ता- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए उसके लिए न्यायाधीशों को आर्थिक रूप से काफी सुदृढ़ बनाया गया है। उन्हें पर्याप्त वेतन एवं मुफ़्त आवास उपलब्ध कराया जाता है। जब वे सेवानिवृत्त हो जाते है तो उन्हें काफी पेंशन भी दिया जाता है।
4. नीचे दी गई समाचार-रिपोर्ट पढ़े और उनमें निम्नलिखित पहलुओं की पहचान करें।
- मामला किस बारे में है?
- उस मामले में लाभार्थी कौन है?
- इस मामले में फरयादी कौन है?
- सोचकर बताएँ कपनी की तरफ से कौन-कौन से तर्क दिए जाएँगे?
- किसानों की तरफ से कौन-कौन से तर्क दिए जाएँगे?
सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस से दहानु के किसानों को 300 करोड़ रुपए देने को कहा-निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 मार्च 2005
मुंबई-सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुंबई के बाहरी इलाके दाहनु में चीकू फल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपए देने के लिए कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अर्जी दी थी। अदालत ने उसी मामले में अपना फ़ैसला सुनाया है।
दहानु मुंबई से 150 किलोमीटर दूर है। एक दशक पहले तक उस इलाके की अर्थ-व्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और दहानु की प्रसिद्धि यहाँ के मछली-पालन तथा जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप-ऊर्जा संयंत्र चालू हुआ और इसी के साथ शुरू हुई इस इलाके की बर्बादी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्र की फ़सल पहली दफा मारी गई। कभी महाराष्ट्र के लिए फलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत फ़सल समाप्त हो चुकी है। मछली पालन बंद हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्थितिक-तंत्र प्रदूषित हो जाता है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को प्रदूषण-नियंत्रण की इकाई स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्फर का उत्सर्जन कम हो। सके। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के आदेश के पक्ष में अपना फ़ैसला सुनाया था। इसके बावजूद 2002 तक प्रदूषण-नियंत्रण का संयंत्र स्थापित नहीं हुआ। सन् 2003 में रिलायंस ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को हासिल किया। सन् 2004 में उसने प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था इसलिए दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने रिलायंस से 300 करोड़ रुपए की बैंक-गारंटी देने को कहा।
उत्तर- यह रिपोर्ट पढ़ने के बाद ज्ञात होता है कि-
मुंबई-सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुंबई के बाहरी इलाके दाहनु में चीकू फल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपए देने के लिए कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अर्जी दी थी। अदालत ने उसी मामले में अपना फ़ैसला सुनाया है।
दहानु मुंबई से 150 किलोमीटर दूर है। एक दशक पहले तक उस इलाके की अर्थ-व्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और दहानु की प्रसिद्धि यहाँ के मछली-पालन तथा जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप-ऊर्जा संयंत्र चालू हुआ और इसी के साथ शुरू हुई इस इलाके की बर्बादी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्र की फ़सल पहली दफा मारी गई। कभी महाराष्ट्र के लिए फलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत फ़सल समाप्त हो चुकी है। मछली पालन बंद हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्थितिक-तंत्र प्रदूषित हो जाता है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को प्रदूषण-नियंत्रण की इकाई स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्फर का उत्सर्जन कम हो। सके। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के आदेश के पक्ष में अपना फ़ैसला सुनाया था। इसके बावजूद 2002 तक प्रदूषण-नियंत्रण का संयंत्र स्थापित नहीं हुआ। सन् 2003 में रिलायंस ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को हासिल किया। सन् 2004 में उसने प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण-नियंत्रण संयंत्र चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था इसलिए दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने रिलायंस से 300 करोड़ रुपए की बैंक-गारंटी देने को कहा।
उत्तर- यह रिपोर्ट पढ़ने के बाद ज्ञात होता है कि-
- यह रिलायंस ताप-ऊर्जा संयंत्र द्वारा उत्पन्न प्रदूषण के विषय से संबंधित विवाद हैं।
- इस मामले में किसान लाभार्थी हैं।
- इस मामले में फरयादी भी किसान हैं।
- इस विवाद पर कंपनी की ओर से उक्त क्षेत्र में ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले लाभों का तर्क दिया जाएगा।
- जबकि किसानों की और से यह तर्क दिया जाएगा कि इस ताप-ऊर्जा संयंत्र से न केवल चीकू की फसल खराब हुई अपितु मत्स्य पालन का धंधा भी चौपट हो गया जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र के लोग भी बेरोजगार हो गए।
5. नीचे की समाचार-रिपोर्ट पढ़े और चिह्नित करें कि रिपोर्ट में किस-किस स्तर की सरकार सक्रिय दिखाई देती है।
- सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की निशानदेही करें।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज की कौन-सी बातें आप इसमें पहचान सकते हैं?
- इस प्रकरण से संबंधित नीतिगत मुद्दे, कानून बनाने से संबंधित बातें, क्रियान्वयन तथा कानून की व्याख्या से जुड़ी बातों की पहचान करें।
सीएनजी-मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार एक साथ
स्टाफ रिपोर्टर, द हिंदू, सितंबर 23, 2001 राजधानी के सभी ग़ैर-सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेंगे। दोनों सरकारों में इस बात पर सहमति हुई है। दिल्ली और केंद्र की सरकार ने पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरी ईंधन-प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फ़ैसला किया है क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है।
राजधानी के निजी वाहन धारकों ने सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी फ़ैसला किया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेंगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जाएगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो-दो मानक को पूरा करते हैं, उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए।
हालाँकि केंद्र और दिल्ली सरकार अलग-अलग हलफनामा दायर करेंगे, लेकिन इनमें समान बिंदुओं को उठाया जाएगा। केंद्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समर्थन देगी।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री राम नाईक के बीच हुई बैठक में ये फ़ैसले लिए गए। श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि केंद्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डॉ० आरए मशेलकर की अगुआई में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने बसों को सीएनजी में बदलने की आखिरी तारीख आगे बढ़ा दे क्योंकि 10,000 बसों को निर्धारित समय में सीएनजी में बदल पाना असंभव हैं। डॉ० मशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश के ऑटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है कि यह समिति छह माह में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत के निर्देशों पर अमल करने के लिए समय की ज़रूरत है। इस मसले पर समग्र दृष्टि अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती शीला दीक्षित ने बताया-'सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूर्ति करने वाले स्टेशनों पर लगी लंबी कतार की समाप्ति, दिल्ली के लिए पर्याप्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदालत के निर्देशों को अमल में लाने के तरीके और साधनों पर एक साथ ध्यान दिया जाएगा।'
सर्वोच्च न्यायालय ने...सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इनकार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए भी सिर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डाला। श्री राम नाईक का कहना था कि केंद्र सरकार सल्फर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकि पूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निर्भर करना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूर्ति पाइप लाईन के जरिए होती है और उसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
उत्तर- उपर्युक्त रिपोर्ट के अंतर्गत यह कहाजा सकता है की उक्त समस्या पर केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें सक्रिय दिखाई देती हैं,केन्द्र सरकार और राज्य स्तर (दिल्ली) की सरकार अर्थात् दिल्ली की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय को सीएनजी विवाद पर संयुक्त रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को सहमत हैं।
स्टाफ रिपोर्टर, द हिंदू, सितंबर 23, 2001 राजधानी के सभी ग़ैर-सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेंगे। दोनों सरकारों में इस बात पर सहमति हुई है। दिल्ली और केंद्र की सरकार ने पूरी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरी ईंधन-प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फ़ैसला किया है क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है।
राजधानी के निजी वाहन धारकों ने सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी फ़ैसला किया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेंगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जाएगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो-दो मानक को पूरा करते हैं, उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए।
हालाँकि केंद्र और दिल्ली सरकार अलग-अलग हलफनामा दायर करेंगे, लेकिन इनमें समान बिंदुओं को उठाया जाएगा। केंद्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समर्थन देगी।
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री राम नाईक के बीच हुई बैठक में ये फ़ैसले लिए गए। श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि केंद्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डॉ० आरए मशेलकर की अगुआई में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने बसों को सीएनजी में बदलने की आखिरी तारीख आगे बढ़ा दे क्योंकि 10,000 बसों को निर्धारित समय में सीएनजी में बदल पाना असंभव हैं। डॉ० मशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश के ऑटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है कि यह समिति छह माह में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत के निर्देशों पर अमल करने के लिए समय की ज़रूरत है। इस मसले पर समग्र दृष्टि अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती शीला दीक्षित ने बताया-'सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूर्ति करने वाले स्टेशनों पर लगी लंबी कतार की समाप्ति, दिल्ली के लिए पर्याप्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदालत के निर्देशों को अमल में लाने के तरीके और साधनों पर एक साथ ध्यान दिया जाएगा।'
सर्वोच्च न्यायालय ने...सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इनकार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए भी सिर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डाला। श्री राम नाईक का कहना था कि केंद्र सरकार सल्फर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकि पूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निर्भर करना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूर्ति पाइप लाईन के जरिए होती है और उसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
उत्तर- उपर्युक्त रिपोर्ट के अंतर्गत यह कहाजा सकता है की उक्त समस्या पर केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें सक्रिय दिखाई देती हैं,केन्द्र सरकार और राज्य स्तर (दिल्ली) की सरकार अर्थात् दिल्ली की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय को सीएनजी विवाद पर संयुक्त रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को सहमत हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका- प्रदूषण से सुरक्षा के लिए राजधानी में सरकारी तथा निजी दोनों प्रकार की बसों में सीएनजी के प्रयोग से छूट देने पर रोक लगाया जाएगा। परंतु न्यायालय ने टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए कभी सीएनजी के लिए दबाव नहीं डाला।
- राजधानी में प्रदूषण हटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया कि केवल सीएनजी वाली बसें ही महानगर में चलाई जाएँ। इसके साथ यह भी तय किया गया कि निजी वाहनों के मालिक को सीएनजी के प्रयोग के लिए उत्साहित किया जाएगा। केन्द्र सरकार तथा दिल्ली सरकार दोनों को अलग-अलग शपथ पत्र दाखिल करने की कहा गया।
- प्रस्तुत रिपोर्ट में नीतिगत मुद्दा प्रदूषण हटाने से संबंधित है। सभी व्यावसायिक वाहन जो यूरो-2 मानक को पूरा करते हैं, उन्हें शहर में चलाने की अनुमति दी जाए। सरकार यह भी चाहती थी कि समय सीमा बढ़ाई जाए, क्योंकि 10,000 बसों को एक निश्चित अवधि में सीएनजी में बदलना करना आसान नहीं है।
6. निम्नलिखित कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं?
सामान्य कानूनों की कोई सहिंता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फ़ैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों की स्पष्ट करने में मदद मिल सकती थी। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फ़ैसले दिए हैं, उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश) में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है, उसे अपना फ़ैसला और उसका कानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में फ़ैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा फ़ैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उत्तर- इस उदाहरण तथा भारत की न्यायपालिका में बहुत असमानता है। भारत में न्यायिक निर्णय एक अभिलेख बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय अथवा प्रसिद्ध न्यायाधीशों के निर्णय दूसरे न्यायालयों में उदाहरण बन जाते हैं। भारत के न्यायाधीश अपनी बुद्धि से स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर निर्णय देते हैं। जरूरत पड़ने पर कानून तथा संविधान में संशोधन करते हैं। इक्वाडोर की अदालत में इस तरह से कार्य नहीं किया जाता। वहाँ की कार्य-प्रणाली भारत से बिलकुल विपरीत है। वहाँ अदालत एक दिन एक प्रकार से तो दूसरे दिन दूसरी तरह से निर्णय देती है और बिना कारण बताए।
सामान्य कानूनों की कोई सहिंता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फ़ैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों की स्पष्ट करने में मदद मिल सकती थी। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फ़ैसले दिए हैं, उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश) में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है, उसे अपना फ़ैसला और उसका कानूनी आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में फ़ैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा फ़ैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उत्तर- इस उदाहरण तथा भारत की न्यायपालिका में बहुत असमानता है। भारत में न्यायिक निर्णय एक अभिलेख बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय अथवा प्रसिद्ध न्यायाधीशों के निर्णय दूसरे न्यायालयों में उदाहरण बन जाते हैं। भारत के न्यायाधीश अपनी बुद्धि से स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर निर्णय देते हैं। जरूरत पड़ने पर कानून तथा संविधान में संशोधन करते हैं। इक्वाडोर की अदालत में इस तरह से कार्य नहीं किया जाता। वहाँ की कार्य-प्रणाली भारत से बिलकुल विपरीत है। वहाँ अदालत एक दिन एक प्रकार से तो दूसरे दिन दूसरी तरह से निर्णय देती है और बिना कारण बताए।
7. निम्नलिखित कथनों को पढ़िए और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमल में लाए जाने वाले विभिन्न क्षेत्राधिकार, मसलन-मूल, अपीली और परामर्शकारी-से इनका मिलान कीजिए।
- सरकार जानना चाहती थी कि क्या वह पाकिस्तान अधिग्रहीत जम्मू कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के संबंध में कानून पारित कर सकती है?
- कावेरी नदी के जल विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है।
- बाँध स्थल से हटाए जाने के विरुद्ध लोगों द्वारा की गई अपील को अदालत ने ठुकरा दिया।
उत्तर-
| i. सरकार जानना ........... पारित कर सकती है? | परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार |
| ii. कावेरी नदी को जल विवाद ........ लेना चाहती है। | मूल क्षेत्राधिकार |
| iii. बाँध स्थल से हटाए जाने के ......... टुकरा दिया। | अपीलीय क्षेत्राधिकार |
8. जनहित याचिका किस तरह गरीबों को मदद कर सकती है?
उत्तर- संविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन न्याय पाने का अधिकार उसी व्यक्ति होता है जिसके मौलिक अतिक्रमण होता है। लेकिन अपने नवीनतम निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने आंग्ल विधि के उक्त नियम में परिवर्तन कर दिया तथा अनुच्छेद 32 का बहुत व्यापक कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि न्यायिक प्रक्रिया लोकहित में सरल व सुलभ हो गई और , पिछड़े, निरक्षर, दलित, निर्धन एवं अक्षम लोगों को शीघ्र न्याय मिलने लगा। नवीनतम निर्णय के अंतर्गत देश का कोई भी नागरिक तथा संस्था जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं स्त्रियों का शोषण, शोषण, पर्यावरण, बाल-श्रम, आदि विषयों पर जनहित याचिका दायर कर सकता है और न्यायालय शीघ्र ही स्वयं जाँच करा कर या वस्तुस्थिति को देखकर, जनहित में निर्णय देता है। इस तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों में दायर की जाती है। कभी-कभी न्यायालय समाचार-पत्रों में छपी खबरों के आधार पर भी जनहित में निर्णय करती है।
जनहित याचिका को 1970 के उत्तरार्द्ध में न्यायाधीश पी०एन० भगवती तथा वी०के० कृष्ण अय्यर ने शुरू किया। आगे चलकर यह याचिका गरीबों के हित में सहायक सिद्ध हुई। इस याचिका से न्याय व्यवस्था अधिक लोकतांत्रिक बनी है। परंतु जहाँ एक ओर गरीब को लाभ मिला है, वहीं न्यायालयों के कार्यों का बोझ और बढ़ गया है।
उत्तर- संविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन न्याय पाने का अधिकार उसी व्यक्ति होता है जिसके मौलिक अतिक्रमण होता है। लेकिन अपने नवीनतम निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने आंग्ल विधि के उक्त नियम में परिवर्तन कर दिया तथा अनुच्छेद 32 का बहुत व्यापक कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि न्यायिक प्रक्रिया लोकहित में सरल व सुलभ हो गई और , पिछड़े, निरक्षर, दलित, निर्धन एवं अक्षम लोगों को शीघ्र न्याय मिलने लगा। नवीनतम निर्णय के अंतर्गत देश का कोई भी नागरिक तथा संस्था जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं स्त्रियों का शोषण, शोषण, पर्यावरण, बाल-श्रम, आदि विषयों पर जनहित याचिका दायर कर सकता है और न्यायालय शीघ्र ही स्वयं जाँच करा कर या वस्तुस्थिति को देखकर, जनहित में निर्णय देता है। इस तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों में दायर की जाती है। कभी-कभी न्यायालय समाचार-पत्रों में छपी खबरों के आधार पर भी जनहित में निर्णय करती है।
जनहित याचिका को 1970 के उत्तरार्द्ध में न्यायाधीश पी०एन० भगवती तथा वी०के० कृष्ण अय्यर ने शुरू किया। आगे चलकर यह याचिका गरीबों के हित में सहायक सिद्ध हुई। इस याचिका से न्याय व्यवस्था अधिक लोकतांत्रिक बनी है। परंतु जहाँ एक ओर गरीब को लाभ मिला है, वहीं न्यायालयों के कार्यों का बोझ और बढ़ गया है।
9. क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से कार्यपालिका और न्यायपालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों?
उत्तर- वर्तमान समय की न्यायिक सक्रियता से कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में न केवल विरोध पनपा है बल्कि इसको लेकर कार्यपालिका तथा विधायिका में जबरदस्त हलचल मची है। न्यायपालिका, विधायिका के माध्यम से निर्मित विधियों का न्यायिक पुनर्वालोकन कर सकती है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका द्वारा निर्मित विधि, संविधान सम्मत् है या नहीं। विधि के संविधान के प्रतिकूल पाए जाने पर न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इसी तरह, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपनी शक्तियों का अतिक्रमण करने वाली कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका द्वारा नियंत्रित की जा सकती है। जब न्यायपालिका अपने सीमा क्षेत्र का अतिक्रमण करती है, तो विधायिका, विधि या संविधान में संशोधन करके, न्यायपालिका के कार्य का परिसीमन कर सकती है। वैसे तो सरकार के तीनों अंगों को मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए, जिससे टकराव की स्थिति पैदा ही न हो। जैसे-दिल्ली में सीएनजी बसों का चालन, वायु प्रदूषण, भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच, चुनाव सुधार जैसे मुद्दों पर।
उत्तर- वर्तमान समय की न्यायिक सक्रियता से कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में न केवल विरोध पनपा है बल्कि इसको लेकर कार्यपालिका तथा विधायिका में जबरदस्त हलचल मची है। न्यायपालिका, विधायिका के माध्यम से निर्मित विधियों का न्यायिक पुनर्वालोकन कर सकती है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका द्वारा निर्मित विधि, संविधान सम्मत् है या नहीं। विधि के संविधान के प्रतिकूल पाए जाने पर न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इसी तरह, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपनी शक्तियों का अतिक्रमण करने वाली कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका द्वारा नियंत्रित की जा सकती है। जब न्यायपालिका अपने सीमा क्षेत्र का अतिक्रमण करती है, तो विधायिका, विधि या संविधान में संशोधन करके, न्यायपालिका के कार्य का परिसीमन कर सकती है। वैसे तो सरकार के तीनों अंगों को मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए, जिससे टकराव की स्थिति पैदा ही न हो। जैसे-दिल्ली में सीएनजी बसों का चालन, वायु प्रदूषण, भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच, चुनाव सुधार जैसे मुद्दों पर।
10. न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से किस रूप में जुड़ी है? क्या उससे मौलिक अधिकारों के विषय क्षेत्र को बढ़ाने में मदद मिली है?
उत्तर- भारत में न्यायिक सक्रियता का जन्म 1970 के दशक में हुआ, जब सर्वोच्च न्यायालय ने समय की माँग को पहचाना और जनता की आवश्यकता को समझा। उसने न्याय व्यवस्था को आम जनता की जीवन-दशा को सुधारने और उसे मूलभूत मानवीय अधिकार दिलाने के लिए सक्रिय भागीदार बना दिया तथा एक के पश्चात एक विषय पर अपना निर्णय देने लगा। सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय इस मान्यता पर भी जोर देता है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन का अर्थ केवल भौतिक अस्तित्व की सुरक्षा मात्र नहीं है अपितु उसकी समस्त नैसर्गिक शक्तियाँ भी हैं। मानव प्रतिष्ठा के साथ-साथ जीवनयापन के अधिकार को इस मौलिक अधिकार के अंतर्गत शामिल किया गया है।
उत्तर- भारत में न्यायिक सक्रियता का जन्म 1970 के दशक में हुआ, जब सर्वोच्च न्यायालय ने समय की माँग को पहचाना और जनता की आवश्यकता को समझा। उसने न्याय व्यवस्था को आम जनता की जीवन-दशा को सुधारने और उसे मूलभूत मानवीय अधिकार दिलाने के लिए सक्रिय भागीदार बना दिया तथा एक के पश्चात एक विषय पर अपना निर्णय देने लगा। सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय इस मान्यता पर भी जोर देता है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन का अर्थ केवल भौतिक अस्तित्व की सुरक्षा मात्र नहीं है अपितु उसकी समस्त नैसर्गिक शक्तियाँ भी हैं। मानव प्रतिष्ठा के साथ-साथ जीवनयापन के अधिकार को इस मौलिक अधिकार के अंतर्गत शामिल किया गया है।