अंतरा - पद्माकर - पुनरावृति नोट्स
CBSE कक्षा 11 हिंदी (ऐच्छिक)
अंतरा काव्य खण्ड
पाठ-4 पद्माकर
पुनरावृत्ति नोट्स
कवि परिचय-
- श्री पद्माकर का जन्म 1733 में बांदा में हुआ। इनके पिता श्री मोहन लाल भट्ट थे। इनके पिता व अन्य वंशज कवि थे इसलिए इनके वंश का नाम कवीश्वर पड़ा। बूँदी नरेश, पन्ना के राजा जयपुर से इन्हें विशेष सम्मान मिला। इनका निधन 1833 में हुआ।
रचनाएँ-
- पद्माभरण, रामरसायन, गंगा लहरी, हिम्मत बहादुर, विरुदावलि, प्रताप सिंह विरुदावलि, प्रबोध पचासा मुख्य रचनाएँ है। कवि राज शिरोमणि की उपाधि से इन्हें सम्मानित किया गया।
काव्यगत विशेषताएँ-
- पद्माकर ने अपना काव्य ब्रजभाषा में रचा है जिसमें अलंकारों की विविधता हैं अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, उप्रेक्षा इनके प्रिय अलंकार है। भाषा भावानुकूल और शब्द चयन विषयानुकूल है। भाषा में प्रवाह और गति हैं। मुहावरे और लोकोक्तियों का सुन्दर प्रयोग किया है। सवैया और कवित्त छंद का सुन्दर प्रयोग किया है।
पद्माकर रीतिकालीन कवि है। अपनी अधिकतर रचनाओं में प्रेम और सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है।
कवित्त-1
"औरें भांति कुंजन .......... बन हैं गए।"
कवि- पद्माकर काल- रीतिकाल छन्द- कवित्त
मूलभाव-
- वसंत ऋतु के आगमन का चित्रण किया है। ऋतुराज के प्राकृतिक सौन्दर्य का तथा नवयुवकों एवं पक्षी समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभावों का चित्रात्मक वर्णन किया है।
व्याख्या-बिंदु-
- ऋतुराज वसंत की मादकता का मनोहारी चित्रण किया है। वसंत के आगमन से प्रकृति की शोभा में वातावरण के सौन्दर्य में वृद्धि होती है। समस्त प्रकृति राग, रस और रंग से पूरित हो उठती है। मन व शरीर में उत्साह का संचार होता है। वसंत ऋतु एक अलग ही प्रकार का चमत्कारपूर्ण प्राकृतिक परिवर्तन और सौन्दर्य लेकर आती है।
विशेष-
- वसंत ऋतु का मोहक चित्रण हुआ है।
- कवित्त की भाषा ब्रज है।
- ‘औरे’ शब्द को बार-बार आवृत्ति करके चमत्कार उत्पन्न किया गया है। (और ही तरह का) इससे अर्थ सौंदर्य में वृद्धि हुई है।
- अनेक स्थलों पर ‘अनुप्रास अलंकार’ की छटा है- ‘भीर भौंरे’, ‘छलिया छबीले छैल छवि छ्वै’।
- भाषा में तुकात्मकता और माधुर्य गुण द्रष्टव्य है।
- शृंगार रस है।
- चित्रात्मक वर्णन है।
- गेयता और संगीतात्मकता विद्यमान है।
गोकुल ................................ निचोरत बनै नहीं।
कवि- श्री पद्माकर, कविता का नाम- प्रकृति और शृंगार
मूलभाव-
- रीतिकालीन कवि पद्माकर की प्रकृति और शृंगार शीर्षक से उद्धरित कवित्त में कवि ने गोकुल में कृष्ण ग्वालों गोपियों की होली के अवसर पर की गई धूम, मस्ती, छेड़छाड़ का वर्णन है। रंग खेलते-खेलते गोपी किस प्रकार कृष्ण को अपना हृदय चोरी-चोरी दे देती है। इसका सुन्दर वर्णन है।
व्याख्या-
- कवि कहता है कि गोकुल में, गलियों में गाँवों में जहाँ तक भी लोग हैं वह कुछ न कुछ अविवेकपूर्ण बातें कर रहे हैं पर कोई किसी की बात का बुरा नहीं मानता है। कवि कहता है कि पड़ोस में पिछवाड़े में सब एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक दौड़ रहे हैं, लेकिन कोई किसी के गुण, अवगुण को नहीं देख रहा है। ऐसे में चतुर सखी के बारें में क्या कहूँ कि दूसरी सखी अपने रंग भीगे वस्त्रों को अभी निचोड़ भी नहीं पाई थी कि उसे पुनः सखी ने रंग डालकर और भिगो दिया। इस सखी को कोई रोक नहीं रहा है। इस पर रंग में भीगी सखी कहती है। कि मैं तो चोरी-चोरी कृष्ण के रंग में रंगी जा चुकी हूँ अर्थात् मेरा तन ही नहीं मन भी स्याम रंग में रंगा जा चुका है। अब अपना मन स्याम रंग में रंगे जाने के पश्चात् उससे मुक्त नहीं होना चाहती। इसलिए अपने रंग में भीगे कपड़े नहीं निचोड़ना चाहती है।
- गोपी श्याम द्वारा रंग डालने पर श्याम के रंग में रंगी जा चुकी है अर्थात् उनसे प्रेम करने लगी है इस अनन्य प्रेम के कारण वह श्याम के डाले रंग को भी निचोड़कर अलग नहीं करना चाहती है।
कला पक्ष-
- ब्रज भाषा का सुंदर प्रयोग।
- तद्भव शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
- कविता में लयबद्धता है।
- कवित्त छंद का प्रयोग किया गया है।
- स्याम रंग में श्लेष अलंकार है। कवि ने श्याम (काला रंग) तथा श्याम अर्थात् कृष्ण के ‘अनुराग’ (प्रेम) रंग की ओर संकेत किया है।
- शृंगार रस के संयोग पक्ष का वर्णन किया गया है।
- गोप-गाउन, कछु तो कछु, पद्माकर परोस पिछवारन, चलित चतुर, चुराई चित चोरा चोरी में अनुप्रास अलंकार है।
- भाषा, भाव एवं विषय के अनुकूल है।
- वर्णों की मधुर आवृत्ति से संगीतात्मकता उत्पन्न हो गई है।
- गोपी के मनोभावों का हृदयग्राही चित्रण है।
- कोमलकांत पदावली में भाषा सरस, मधुर एवं प्रवाह लिए हुए है।