भारत के विदेश सम्बन्ध - एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर
CBSE Class 12 राजनीति विज्ञान
एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर
पाठ-4
भारत के विदेश संबंध
एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर
पाठ-4
भारत के विदेश संबंध
1. इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ:
(क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
(क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
उत्तर- (क) ✔
(ख) ✔
(ग) ✔
(घ) ✕
(ख) ✔
(ग) ✔
(घ) ✕
2. निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ:
| (क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य | (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए | |
| (ख) पंचशील | (ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास। |
| (ग) बांडुग सम्मेलन | (iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत। |
| (घ) दलाई लामा | (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आदिोलन में हुई। |
उत्तर- (क)-(ii)
(ख)-(iii)
(ग)-(iv)
(घ)-(i)
(ख)-(iii)
(ग)-(iv)
(घ)-(i)
3. नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।
उत्तर- (i) भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा। इस लक्ष्य की प्रतिध्वनि संविधान के अनुच्छेद 51 के नीति-निर्देशक तत्वों में दिखाई देती है।
(ii) भारत ने हमेशा गुटनिरपेक्षता की नीति को अपने रखा , शीतयुद्ध से हुए तनावों को कम करने का प्रयास किया और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा शांति बनाए रखने के प्रयासों के लिए मानव संसाधनों द्वारा प्रोत्साहन किया।
इस प्रकार भारत स्वाधीनता कायम कर और दोनों ही गठबंधनों के सदस्यों से सहायता प्राप्त की।
(ii) भारत ने हमेशा गुटनिरपेक्षता की नीति को अपने रखा , शीतयुद्ध से हुए तनावों को कम करने का प्रयास किया और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा शांति बनाए रखने के प्रयासों के लिए मानव संसाधनों द्वारा प्रोत्साहन किया।
इस प्रकार भारत स्वाधीनता कायम कर और दोनों ही गठबंधनों के सदस्यों से सहायता प्राप्त की।
4. ‘विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।' 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर-1962 के भारत-चीन संघर्ष के दौरान साबित होता है, जिसने भारत की छवि को घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर ठीक किया। अंग्रेजों की सैन्य सहायता से भारत को मसलों को हल करने में सहायता मिली। सोवियत संघ इस संषर्ष के समय तटस्थ रहा-
(i) इन समस्त घटनाओं से राष्ट्र के स्वाभिमान को चोट पहुँची, परन्तु इसने दूसरी तरफ राष्ट्रवाद की भावना का भी विस्तार किया।
(ii) देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था, तब नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था तथा लोकसभा में इस पर बहस हुई।
(iii)चीन के इरादों को समय रहते न समझा यगा और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई।
(iv)चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत के नेताओं को पूर्वोत्तर की बेकार स्थिति के प्रति सचेत किया।
(v) भारत-चीन संघर्ष की वजह से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई व चीन के पक्षधर खेमे ने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई।
(vi) यह इलाका अत्यंत पिछड़ी दशा में था और अलग-थलग रह गया था। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वजह से भी यह इलाका चुनौतिपूर्ण था।
(i) इन समस्त घटनाओं से राष्ट्र के स्वाभिमान को चोट पहुँची, परन्तु इसने दूसरी तरफ राष्ट्रवाद की भावना का भी विस्तार किया।
(ii) देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा था, तब नेहरू की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था तथा लोकसभा में इस पर बहस हुई।
(iii)चीन के इरादों को समय रहते न समझा यगा और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई।
(iv)चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत के नेताओं को पूर्वोत्तर की बेकार स्थिति के प्रति सचेत किया।
(v) भारत-चीन संघर्ष की वजह से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई व चीन के पक्षधर खेमे ने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई।
(vi) यह इलाका अत्यंत पिछड़ी दशा में था और अलग-थलग रह गया था। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वजह से भी यह इलाका चुनौतिपूर्ण था।
5. अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए, तो आप इसकी किन दो बातों को बदलना चाहेंगे। ठीक इसी तरह यह भी बताएँ कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर- दो पहलू जिन्हें बरकरार रखना चाहेंगे-
(i) भारत ने हमेशा अपना आत्मसम्मान बनाए रखा है और शांतिप्रिय देश के रूप में भी दूसरे देशों के मध्य समानता व सामंजस्य पैदा करने के लिए प्रयास किया, जैसे-भारत ने 1953 में कोरियाई युद्ध को खत्म करने, चीन में फ्रांसीसी शासन तथा वियतनाम में अमरीका की भूमिका को खत्म करने में प्रोत्साहन दिया।
(ii) आपसी सामंजस्य और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की दिशा में किए गए प्रयास हमेशा सराहनीय रहे हैं। शीतयुद्ध की समाप्ति के समय भी गुटनिरपेक्षता सुरक्षा परिषद को ज्यादा प्रभावशाली और लोकतांत्रिक बनाने के लिए एक प्रभावशाली हथियार रही थी।
(i) भारत ने हमेशा अपना आत्मसम्मान बनाए रखा है और शांतिप्रिय देश के रूप में भी दूसरे देशों के मध्य समानता व सामंजस्य पैदा करने के लिए प्रयास किया, जैसे-भारत ने 1953 में कोरियाई युद्ध को खत्म करने, चीन में फ्रांसीसी शासन तथा वियतनाम में अमरीका की भूमिका को खत्म करने में प्रोत्साहन दिया।
(ii) आपसी सामंजस्य और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की दिशा में किए गए प्रयास हमेशा सराहनीय रहे हैं। शीतयुद्ध की समाप्ति के समय भी गुटनिरपेक्षता सुरक्षा परिषद को ज्यादा प्रभावशाली और लोकतांत्रिक बनाने के लिए एक प्रभावशाली हथियार रही थी।
दो बातें जो बदलना चाहेंगे-
(i) पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ भारत के विवादों ने 'सार्क' के अन्दर क्षेत्रीय सहयोग की धारणा को आहत किया।
(ii)1962-72 के कालांश में भारत ने तीन युद्ध किए तथा इसकी शांतिप्रिय छवि ने बहुत ही सीमित भूमिका अदा की।अतएव, भारत को अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के लिए अपनी विदेश नीति में कूटनीतिक तरीकों को अपनाना चाहिए, जिससे देश की रक्षा की जा सके।
(i) पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ भारत के विवादों ने 'सार्क' के अन्दर क्षेत्रीय सहयोग की धारणा को आहत किया।
(ii)1962-72 के कालांश में भारत ने तीन युद्ध किए तथा इसकी शांतिप्रिय छवि ने बहुत ही सीमित भूमिका अदा की।अतएव, भारत को अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के लिए अपनी विदेश नीति में कूटनीतिक तरीकों को अपनाना चाहिए, जिससे देश की रक्षा की जा सके।
6. निम्नलिखित पर संक्षित टिप्पणी लिखिए:
(क) भारत की परमाणु नीति।
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति।
(क) भारत की परमाणु नीति।
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति।
उत्तर- (क) भारत की परमाणु नीति
- भारत ने परमाणु नीति में सैद्धांतिक तौर पर यह बात स्वीकार की कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, लेकिन इन हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा। भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभावहीन परमाणु नि:शस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है, ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो सके।
- पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत बनाने के लिए विज्ञान और तकनीकी को हमेशा प्रोत्साहन दिया। उदाहरण-1940 में होमी जे० भाभा के निर्देशन में परमाणु कार्यक्रम के लिए प्रयास किए गए।
- भारत परमाणु हथियारों के विरुद्ध था। अत: महाशक्तियों के साथ परमाणु नि:शस्त्रीकरण पर जोर दिया।
- भारत ने एन०पी०टी० (NPT) को हमेशा भेदभावपूर्ण माना और इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।
- मई 1974 में भारत का पहला परमाणु-परीक्षण शांतिपूर्ण विस्फोट माना गया और भारत ने परमाणु-शक्ति को केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रयोग करने पर जोर दिया।
- भारत वर्तमान में एन. एस. जी. (NSG) के पूर्ण सदस्य बनने के लिए प्रयासरत है।
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति
- पंडित नेहरू ने राष्ट्रीय एजेंडा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
- प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री के रूप में 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला।
- जब भी विभिन्न पार्टियाँ समय-समय पर सत्ता में आई, भारत की विदेश नीति ने पार्टी-राजनीति में बहुत सीमित भूमिका निभाई।
7. भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन, 1962-1971 की अवधि यानी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा, आप इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- नहीं, यह विदेश नीति की असफलता नहीं थी, बल्कि यह अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम थी-
चीनी आक्रमण, 1962
- 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया, तब गंभीर विवाद उठ खड़ा हुआ और भारत ने इसका खुलकर विरोध भी नहीं किया।
- जब चीन ने तिब्बती संस्कृति को खत्म करना शुरू कर दिया, तब भारत को चिंता होने लगी।
- दूसरा सीमा विवाद, तब उठ खड़ा हुआ, जब चीन ने अक्साईचीन और नेफा (उत्तर-पूर्वी सीमांत) के अधिकांश हिस्सों पर अपना अधिकार जताया।
- लम्बे विचार-विमर्श और पत्राचार के बाद भी ये मसले देश के शीर्ष नेताओं द्वारा भी हल नहीं हुए हैं।
- अतएव, भारत को विवाद में भाग लेना पड़ा।
पाकिस्तान के साथ युद्ध
- कश्मीर-विभाजन के ऊपर पाकिस्तान के प्रयासों के साथ 1965 में दोनों देशों के बीच गंभीर सशस्त्र विद्रोह शुरू हुए।
- 1966 में संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के साथ ये तनाव समाप्त हुए और भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
- 1965 के युद्ध ने भारत की पहले से खराब आर्थिक स्थिति को और ज्यादा खराब कर दिया था।
1971 का बांग्लादेश युद्ध
- 1970 में पाकिस्तान के सामने एक गहरा अंदरूनी संकट आ खड़ा हुआ तथा एक खंडित जनादेश आया। जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में विजयी रही, जबकि मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में ज़ोरदार कामयाबी हासिल की।
- पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनता ने पश्चिमी पाकिस्तान की भेदभावपूर्ण नीति के विरोध में प्रदर्शन किया, जोकि पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों को स्वीकार्य नहीं था।
- 1971 में पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिए। इसके जवाब में पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने अपने इलाके यानी मौजूदा बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्त कराने के लिए संघर्ष छेड़ दिया।
- भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा। ये शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भागकर भारत के नजदीकी इलाकों में शरण लिए हुए थे। भारत ने बांग्लादेश के 'मुक्ति संग्राम' को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी।
- एक पूर्णव्यापी युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच दिसम्बर 1971 में छिड़ गया, जब पाकिस्तान ने पंजाब और राजस्थान पर आक्रमण किया।
- दस दिनों के अंदर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया। बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया और भारत व पाकिस्तान के बीच 1972 में शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
- अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य पराक्रम प्रबल हुआ है।
8. क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।
उत्तर- बांग्लादेश युद्ध, 1971
- 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया। जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी को पश्चिमी पाकिस्तान में जीत हासिल हुई ,जबकि मुजीबुर्रहमान की पार्टी आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में जोरदार कामयाबी हासिल की।
- पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के द्वारा अपने साथ हुए दोयम दर्जे के नागरिक जैसे बर्ताव के बदले में पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनता ने इस पार्टी को वोट दिया था। पाकिस्तान के शासक इस जनादेश को स्वीकार नहीं कर पाऐ ।
- पाकिस्तानी सेना ने 1971 में शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। जवाब में पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग के लिए संघर्ष छेड़ दिया।
- भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ उठाना पड़ा, ये शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भागकर भारत के पास के इलाकों में शरण लिए हुए थे। भारत ने बांग्लादेश के 'मुक्ति संग्राम' को नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी।
- दिसम्बर 1971 में भारत और पाकिस्तान के मध्य एक पूर्णव्यापी युद्ध छिड़ गया, जब पाकिस्तान ने पंजाब और राजस्थान पर आक्रमण किया।
- दस दिनों के भीतर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और पाकिस्तान को आत्मसमर्पण करना पड़ा। बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया और भारत व पाकिस्तान के बीच 1972 में शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
- अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य पराक्रम प्रबल हुआ है।
उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि ‘हाँ’, भारत की विदेश नीति से झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है जो कि 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय प्रदर्शित होता है।
9. किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति के उदाहरण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए।
उत्तर- किसी देश की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों का दर्पण होती है-
- गैर-कांग्रेसवादी सरकार1977 में के समय जनता पार्टी ने सच्ची गुट-निरपेक्षता नीति का पालन करने की घोषणा की, जिसका आशय था कि विदेश नीति में सोवियत संघ के प्रति आए झुकाव को खत्म किया जाएगा। इसके पश्चात की सभी सरकारों ने चीन के साथ अच्छा संबंध बनाने और अमरीका के साथ करीबी रिश्ते बनाने की पहल की।
- रूस लगातार भारत का एक अच्छा मित्र बना हुआ है, लेकिन 1990 के पश्चात रूस का अंतर्राष्ट्रीय महत्व कम हुआ है। इसलिए भारत की विदेश नीति में अमरीका समर्थक रणनीतियाँ अपनाई गई हैं।
- इसके अलावा , मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में सैन्य हितों के अतिरिक्त आर्थिक हितों का जोर ज्यादा है। इसका भी असर भारत की विदेश नीति में अपनाए गए विकल्पों पर पड़ता हुआ दिखाई दिया, जैसे भारत-पाक संबंधों में भी कई नई बातें जुड़ीं।
10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:
गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है, अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना... इसका अर्थ होता है, चीज़ों यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना.
गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है, अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना... इसका अर्थ होता है, चीज़ों यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना.
-जवाहरलाल नेहरू
(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(ग) अगर सैन्य-गुट न होते, तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(ग) अगर सैन्य-गुट न होते, तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?
उत्तर- (क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी इसलिए बनाऐ रखना चाहते थे, क्योंकि वे संसार के दूसरे देशों के साथ मित्रतापूर्ण व शांतिपूर्ण रिश्ता बनाना चाहते थे, ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि औरों से अलग हो।
(ख) नहीं, भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि यह सैन्य संबंधों को कायम रखने के लिए नहीं था, वरन् कूटनीतिक मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के लिए था।
(ग) गुटनिरपेक्षता की नीति ने सैन्य गठबंधनों से दूर रहने के अलावा आतंकवाद के खत्म करने के साथ ही नि:शस्त्रीकरण और अनौपनिवेशीकरण पर भी जोर दिया।
(ख) नहीं, भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि यह सैन्य संबंधों को कायम रखने के लिए नहीं था, वरन् कूटनीतिक मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के लिए था।
(ग) गुटनिरपेक्षता की नीति ने सैन्य गठबंधनों से दूर रहने के अलावा आतंकवाद के खत्म करने के साथ ही नि:शस्त्रीकरण और अनौपनिवेशीकरण पर भी जोर दिया।