संघवाद - एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर

सीबीएसई कक्षा - 11 राजनीति विज्ञान
एनसीईआरटी प्रश्नोत्तर
पाठ - 7 संघवाद

1. नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से आप किसको संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?
  1. केंद्र सरकार ने मंगलवार को जीएनएलएफ के नेतृत्व वाले दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची में वर्णित दर्जा देने की घोषणा की। इससे पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय जिले के शासकीय निकाय को ज़्यादा स्वायत्तता प्राप्त होगी। दो दिन के गहन विचार-विमर्श के बाद नई दिल्ली में केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
  2. वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए सरकार कार्ययोजना लायेगी। केंद्र सरकार ने वर्षा प्रभावित प्रदेशों से पुनर्निमाण की विस्तृत योजना भेजने को कहा है ताकि वह अतिरिक्त राहत प्रदान करने की उनकी माँग पर फौरन कार्रवाई कर सके।
  3. दिल्ली के लिए नए आयुक्त। देश की राजधानी दिल्ली में नए नगरपालिका आयुक्त को बहाल किया जाएगा। इस बात की पुष्टि करते हुए एमसीडी के वर्तमान आयुक्त राकेश मेहता ने कहा है कि उन्हें अपने तबादले के आदेश मिल गए हैं और संभावना है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार उनकी जगह संभालेंगे। अशोक कुमार अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव की हैसियत से काम कर रहे हैं। 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री मेहता पिछले साढ़े तीन साल से आयुक्त की हैसियत से काम कर रहे हैं।
  4. मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा। राज्यसभा ने बुधवार को मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करने वाला विधेयक पारित किया। मानव संसाधन विकास मंत्री ने वायदा किया है कि अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी ऐसी संस्थाओं का निर्माण होगा।
  5. केंद्र ने धन दिया। केंद्र सरकार ने अपनी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को 553 लाख रुपए दिए हैं। इस धन की पहली किस्त के रूप में अरुणाचल प्रदेश को 466 लाख रुपए दिए गए हैं।
  6. हम बिहारियों को बताएँगे कि मुंबई में कैसे रहना है। करीब 100 शिव सैनिकों ने मुंबई के जे०जे० अस्पताल में उठा-पटक करके रोजमर्रा के कामधंधे में बाधा पहुँचाई, नारे लगाए और धमकी दी कि गैर-मराठियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो वे इस मामले को स्वयं ही निपटाएँगे।
  7. सरकार को भंग करने की माँग। कांग्रेस विधायक दल ने प्रदेश के राज्यपाल को हाल में सौंपे एक ज्ञापन में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ़ नागालैंड (डीएएन) की सरकार को तथाकथित वित्तीय अनियमितता और सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में भंग करने की माँग की है।
  8. एनडीए सरकार ने नक्सलियों से हथियार रखने को कहा। विपक्षी दल राजद और सहयोगी कांग्रेस तथा सीपीआई (एम) के वॉकआऊट के बीच बिहार सरकार ने आज नक्सलियों से अपील की कि वे हिसा का रास्ता छोड़ दें। बिहार को विकास के नए युग में ले जाने के लिए बेरोजगारी को जड़ से खत्म करने के अपने वादे को भी सरकार ने दोहराया।
उत्तर-
  1. प्रथम सूची 'i' की घटना को संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में देखा जा सकता है, घीसिंग के नेतृत्व वाले जीएनएलएफ के मध्य त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
  2. द्वितीय सूची 'ii' की घटना भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाता है।
  3. तीसरी सूची 'iii' की घटना को भी संघवाद के रूप में दर्शाया जा सकता है। क्योंकि संघीय शासन व्यवस्था में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का तबादला एक राज्य से दूसरे में केंद्र सरकार करती है अर्थात् यह भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाता करता है।
  4. चौथी सूची 'iv' में मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने का अधिकार केंद्र को है, चूँकि किसी राज्य की स्थापना, सीमा नाम में बदलाव इत्यादि का अधिकार केंद्र की है। अतः इसे भी संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।
  5. प्रश्न की पाँचवीं सूची भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाता है।
  6. छठी सूची 'vi' की घटना संघवाद की कार्यप्रणाली के प्रतिकूल है, क्योंकि संघीय व्यवस्था में एकहरी नागरिकता प्रदान की जाती है तथा देश का कोई भी नागरिक देश के किसी राज्य में रह सकता है।
  7. सातवी सूची 'vii' की घटना संघीय प्रणाली का परिचायक है, क्योंकि संविधान के अंतर्गत जब किसी राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगती है, तो केंद्र को अधिकार है कि वह राज्यपाल से संपूर्ण स्थिति का विवरण माँगे और राज्यपाल की अनुशंसा पर राज्य में सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू करे।
  8. प्रश्न की आठवी अर्थात् अंतिम सूची 'viii' संघीय प्रणाली के अनुरूप नहीं है, क्योंकि उक्त घटना राज्य सरकार के अधीन है।

2. बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
  1. संघवाद से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे और उन्हें इस बात का भय नहीं रहेगा कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
  2. अलग-अलग किस्म के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेन-देन का संघीय प्रणाली से बाधा पहुँचेगी।
  3. संघीय प्रणाली इस बात को सुनिश्चित करती है कि जो केंद्र में सत्तासीन हैं, उनकी शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर- कथन 'i.' सही होगा, क्योंकि संविधान के अंतर्गत भारत की राज्यों का संघ कहा गया है। यहाँ एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र के लोग के साथ मेल-जोल से रह सकते हैं। बिना अपनी संस्कृति को खोए।

3. बेल्ज़ियम के संविधान के कुछ प्रारम्भिक अनुच्छेद नीचे लिखे गए हैं। इसके आधार पर बताएँ कि बेल्ज़ियम संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करके देखें।
शीर्षक-I
 : संघीय बेल्ज़ियम, उसके घटक और इसका क्षेत्र।
अनुच्छेद-1 : बेल्ज़ियम एक संघीय राज्य है-जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है।
अनुच्छेद-2 : बेल्ज़ियम तीन समुदायों से बना है-फ्रैंच समुदाय, फ्लेमिश समुदाय और जर्मन समुदाय।
अनुच्छेद-3 : बेल्ज़ियम तीन क्षेत्रों का मिलाकर बना है-वैलून क्षेत्र, फ्लेमिश क्षेत्र और ब्रूसेल्स क्षेत्र।
अनुच्छेद-4 : बेल्ज़ियम में 4 भाषाई क्षेत्र हैं-फ्रैंच-भाषी क्षेत्र, डच भाषी क्षेत्र, ब्रुसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र। राज्य का प्रत्येक 'कम्यून' इन भाषाई क्षेत्रों में से किसी एक का हिस्सा है।
अनुच्छेद-5 : वैलून क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले प्रांत हैं-वैलून, ब्राबैंट, हेनॉल्ट, प्लेग, लक्जमबर्ग और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अंतर्गत शामिल प्रांत हैं-एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिबर्ग।
उत्तर- अनुच्छेद-1 : बेल्ज़ियम एक संघीय राज्य है जो समुदायों तथा क्षेत्रों से बना है। भारत के संविधान का प्रथम अनुच्छेद है-(i) भारत राज्यों का एक संघ है, (ii) राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में निर्दिष्ट हैं, (iii) भारत के राज्य क्षेत्र में-(क) राज्यों के राज्य क्षेत्र, (ख) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघराज्य क्षेत्र और, (ग) ऐसे अन्य राज्य क्षेत्र जो अर्जित किए जाएँ, समाविष्ट होंगे।
अनुच्छेद-2 : बेल्ज़ियम तीन समुदायों से मिलकर बना है-फ्रैंच, जर्मन और फ्लेमिश। लेकिन भारत एक ऐसे समाज के लिए प्रेरित है जो जाति भेद की भावना से ऊपर हो।
अनुच्छेद-3 : बेल्ज़ियम तीन क्षेत्रों से बना है-(i) फ्लेमिश क्षेत्र (ii)वैलून क्षेत्र (iii) ब्रूसेल्स क्षेत्र।
भारत 28 राज्यों तथा 7 केंद्रशासित प्रदेशों को मिलाकर बना है। अनुच्छेद-1 के अनुसार भारत राज्यों का संघ होगा। राज्य तथा संघ शासित प्रदेश वे हाँगे जो अनुसूची (i) में दिए गए हैं।
अनुच्छेद-4 : बेल्ज़ियम में चार भाषाई क्षेत्र हैं-फ्रैंच भाषी क्षेत्र, , ब्रूसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र, डच भाषी क्षेत्र, राज्य के प्रत्येक 'कम्यून' इन भाषाई क्षेत्रों में किसी एक का हिस्सा है। भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं का उल्लेख संविधान की आठवीं अनुसूची में है। इस समय अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ हैं। ब्यौरा इस प्रकार है-असमिया, बंगला, गुजराती, मलयालम, मराठी, उडिया, पंजाबी, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, संस्कृत, सिंधी, (संविधान के 21वे संशोधन द्वारा प्रविष्ट) तमिल,मणिपुरी, मैथिली, डोगरी, संथाली तेलगु, उर्दू, नेपाली, कोंकणी, तथा बोडो। इस प्रकार आज संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं की कुल संख्या 22 है। अनुच्छेद 345 के अधीन प्रत्येक राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार दिया गया है कि वह संविधान की आठवीं अनुसूची में अंतर्निहित भाषाओं में से किसी एक या एक से अधिक सरकारी कार्यों के लिए राज्य की भाषा के रूप में अंगीकार कर सकता है। किंतु राज्यों के परस्पर संबंधों तथा संघ और राज्यों के परस्पर संबंधों में संघ की राजभाषा को ही प्राधिकृत भाषा माना जाएगा।
अनुच्छेद-5 : वैलून क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले प्रांत हैं-वैलून, ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग, और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अंतर्गत शामिल प्रांत हैं-एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिंबर्ग। भारतीय संविधान में अलग-अलग क्षेत्रों का उल्लेख नहीं किया गया। परंतु इनकी तुलना हम पहाड़ी क्षेत्र, उत्तरी क्षेत्र, पश्चिमी क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र, पूर्वी क्षेत्र, पूर्वोत्तर भारत तथा मध्य भारत आदि के रूप में कर सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद एक में केवल इतना ही कहा गया है-
भारत राज्यों का संघ होगा, जिसमें राज्य तथा संघ शासित प्रदेश इस प्रकार सम्मिलित होंगे जैसे अनुसूची (i) में वर्णित किया गया है।

4. कल्पना करें कि आपको संघवाद के संबंध में प्रावधान लिखने हैं-लगभग 300 शब्दों में एक लेख लिखें जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर आपके सुझाव हों-
  1. केंद्र और प्रदेशों के मध्य शक्तियों का बँटवारा
  2. वित्त-संसाधनों का वितरण
  3. राज्यपालों की नियुक्ति
उत्तर-
  1. केंद्र और प्रदेशों के मध्य शक्तियों का बँटवारा- संघात्मक शासन के द्वारा सरकार को दो बागो में बांटा जाता है -एक संघ और दूसरी इकाई (राज्य) की। संविधान द्वारा इन दोनों का शक्ति विभाजन किया गया है। लेकिन इस विभाजन में केंद्र को अधिक शक्ति दी गई है। क्योंकि संघ सूची में 97 विषय दिए गए हैं, जबकि राज्य सूची में 66 विषय हैं और समवर्ती सूची में 47 विषय हैं। संविधान के अंतर्गत समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार संघ तथा राज्य व्यवस्थापिका दोनों को दिया गया है। लेकिन कानून निर्माण की प्रक्रिया में परस्पर विरोध की स्थिति में संघ के कानून मान्य होंगे। इसके अलावा अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र को ही प्रदान की गई हैं और राज्य सूची के विषय पर भी अनुच्छेद 249 (i) द्वारा संसद को राष्ट्रीय हित में विधि बनाने का अधिकार है।
    मूल संविधान द्वारा संघ और राज्य व्यवस्थापिका के मध्य शक्तियों का जो वितरण हुआ है, उसमें भी 42वें संशोधन द्वारा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर दिया गया है और राज्य सूची के चार विषयों को समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिया गया है। वे चार विषय हैं-शिक्षा, वन, जंगली जानवरों की रक्षा तथा नाप-तौल।
    केंद्र-राज्य संबंध के कुछ संवैधानिक प्रावधान-
    अनुच्छेद 246- संसद को सातवी अनुसूची की सूची 1 में प्रमाणित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति।
    अनुच्छेद 256- यदि आपात् की घोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्य सूची के विषय के संबंध में कानून बनाने की संसद की शक्ति।
    अनुच्छेद 252- यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल यह संकल्प पारित करते हैं कि राज्य सूची में दिए गए किसी विषय पर संसद द्वारा कानून बनाया जाए तो संसद ऐसे राज्यों के संबंध में कानून बना सकती है।
    अनुच्छेद 257- संघ की कार्यपालिका किसी राज्य को निर्देश दे सकती है।
    अनुच्छेद 257- (क) संघ के सशस्त्र बलों या अन्य बलों के अभियोजन द्वारा राज्यों की सहायता।
    अनुच्छेद 263- अंतर्राज्यीय परिषद् का प्रावधान।
  2. वित्तीय संसाधनों का वितरण- संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों का निरूपण निम्न प्रकार से किया गया है:-
  3. कर निर्धारण, शक्ति का वितरण और करों से प्राप्त आय का विभाजन- भारतीय संविधान में वित्तीय प्रावधानों की दो विशेषताएँ हैं-प्रथम, कर निर्धारण की शक्ति का दोनों के बीच पूर्ण विभाजन; द्वितीय, करों से प्राप्त आय का विभाजन। संघ के प्रमुख राजस्व स्रोत-निगम कर, बीमा शुल्क, निर्यात शुल्क, कृषि भूमि को छोड़कर अन्य कर, संपत्ति पर संपदा शुल्क, विदेशी ऋण, रिजर्व बैंक, शेयर बाज़ार आदि। राज्य के स्रोत हैं-प्रति व्यक्ति कर, बिजली उपयोग पर कर, वाहनों पर चुंगी कर, कृषि पर कर आदि।
  4. संघ द्वारा आरोपित तथा संग्रहीत विनियोजित किए जाने वाले शुल्कों के उदाहरण हैं- प्रोमिसरी, नोटों, हुण्डियों, बिल, विनियमों,चेकों आदि पर मुद्रांक शुल्क, शौक-शृंगार की चीज़ों पर कर तथा उत्पाद शुल्क। संघ द्वारा आरोपित तथा संग्रहीत, किंतु राज्यों को सौंपे जाने वाले करों के उदाहरण हैं-कृषि भूमि के अतिरिक्त अन्य संपत्ति के उत्तराधिकारी पर कर, रेल, समुद्र, वायु द्वारा ले जाने वाले माल तथा यात्रियों पर सीमांत कर, रेल भाड़ों तथा वस्तु भाड़ों पर कर, समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय पर कर।
  5. राज्यपालों की नियुक्ति- राज्यों में राज्यपाल की भूमिका कार्यपालिका के प्रधान की होती है। राष्ट्रपति द्वारा इसकी नियुक्ति की जाता है। राष्ट्रपति साधारणतः उसके लिए मंत्रिपरिषद् से परामर्श करता है। वर्तमान समय में मंत्रिपरिषद् भी ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करने की अनुशंसा करती है जो उसका विश्वासपात्र होता है और राज्यपाल राज्यों में केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं। इसके माध्यम से केंद्र राज्यों के शासन पर अंकुश रख सकता है।

5. निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए और क्यों?
  1. सामान्य भाषा
  2. सामान्य आर्थिक हित
  3. सामान्य क्षेत्र
  4. प्रशासनिक सुविधा।
उत्तर- अंग्रेज़ों द्वारा भारत के राज्यों का गठन प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से किया था। लेकिन वर्तमान समय में भाषाई आधार पर प्रांत का गठन किया जा सकता है। क्योंकि कोई एक इकाई प्रांत, भाषाई समुदाय के आधार पर संघ का निर्माण नहीं करते हैं। समाज विविधताओं का एक समूह होता हैं तथा इसके साथ ही आपसी विश्वास एवं सहयोग के आधार पर संघवाद के संचालन के लिए प्रयास किया जाता है। कई इकाई, प्रांत, भाषायी समुदाय आदि मिलकर संघ का निर्माण करते हैं और संघवाद मज़बूती के साथ आगे बढ़े, उसके लिए इकाइयों में टकराव कम से कम हो अर्थात् भारत में राज्यों का पुनर्गठन भाषायी आधार पर किया गया है। कोई एक भाषायी समुदाय पूरे संघ पर हावी न हो जाए, इस कारण इकाई क्षेत्रों की अपनी भाषा, धर्म, संप्रदाय या सामुदायिक पहचान बनी रहती है और वे इकाई होते हुए भी संघ की एकता में विश्वास रखती है।

6. भारत के प्रदेशों-राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि उन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाय तो क्या ऐसा करना संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर- भारत के ज़्यादातर राज्यों हिंदी भाषा बोली जाती हैं। भाषा के आधार पर इन सभी प्रांतों को मिलाकर यदि एक प्रदेश बना दिया जाए तो यह संघवाद के विचार से संगत नहीं होगा। क्योंकि संघीय प्रणाली में द्विव्यवस्थापिका है-एक केंद्र की, दूसरी प्रांत की अर्थात् उसके अंतर्गत लोगों की पहचान दोहरी होती है-प्रथम क्षेत्रीय पहचान, द्वितीय राष्ट्रीय पहचान है।

7. भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिसमें प्रादेशिक सरकार की अपेक्षा केद्रीय सरकार को अधिक शक्ति प्रदान की गई है।
उत्तर- भारतीय संविधान संघात्मक शासन की व्यवस्था करता है। यहाँ एक संघ की सरकार होती है और दूसरी इकाई की। दोनों सरकारों की शक्तियों का विभाजन भी संविधान के अनुसार किया गया है। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में केंद्र को इकाई की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बनाया गया है, जिसका उल्लेख यहाँ किया जा रहा है-
  1. संविधान में केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने का उल्लेख मिलता है। किसी राज्य के अस्तित्व और भौगोलिक सीमाओं पर केंद्र का नियंत्रण होता है संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार संसद का यह अधिकार है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर नए राज्य का पुनर्गठन कर सकती है। राज्यों के नाम में परिवर्तन भी कर सकती है।
  2. केंद्र को आपातकालीन शक्ति भी प्राप्त है वह आपातकाल में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है।
  3. सामान्य स्थिति में भी केद्र सरकार को शक्तिशाली बनाया हुआ है। आय के सभी प्रमुख स्रोत पर केंद्र का नियंत्रण है जिससे अनुदान के लिए राज्यों को केंद्र पर आश्रित रहना पड़ता है। स्वतंत्र भारत में आर्थिक प्रगति के लिए नियोजन का प्रयोग किया गया है। केंद्र योजना आयोग की नियुक्ति करता है। योजना आयोग राज्यों के संसाधन प्रबंधन की निगरानी करता है। केंद्र सरकार राज्यों को अनुदान और ऋण देती है जिसमें विभिन्न राज्यों के साथ भेदभाव की संभावना बनी रहती है।
  4. धारा 356 के माध्यम से भी केंद्र प्रभावी हो जाता है, क्योंकि राज्यपाल केंद्र के ऐजेंट के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का प्रधान होता है जिस कारण उसको यह अधिकार है कि वह राज्य की संपूर्ण स्थिति से केंद्र को अवगत कराए। इसके अतिरिक्त उसे यह भी शक्ति प्राप्त है कि विधान मंडल द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सके।
  5. अनुच्छेद 249 (i) द्वारा संसद को राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय हित में विधि बनाने का अधिकार है, पर ऐसा करने के लिए पहले राज्य सभा की अनुमति लेनी पड़ती है।

8. बहुत से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर- राज्यपाल राज्य का संवैधानिक कार्यकारी होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। उसका कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है, परंतु वह राष्ट्रपति की इच्छापर्यंत अपने पद पर बना रहता है। परंतु हाल के कुछ वर्षों से राज्यपाल की भूमिका, अधिकार क्षेत्र, नियुक्ति के तरीके आदि को लेकर केंद्र और राज्य में मतभेद उत्पन्न हुए हैं। विरोधी दल की राज्य सरकारें बराबर यह आरोप लगाती रही हैं कि केंद्र राज्यपाल के माध्यम से उनकी सरकारों को पदच्युत करने में लगी रहती है। इस आरोप का प्रत्यक्ष उदाहरण 21 फरवरी, 1998 को तब देखने को मिला, जब राज्यपाल रमेश भडारी ने सत्तासीन कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया, जो लोकतांत्रिक आदर्शों के सर्वथा प्रतिकूल था। इसी तरह की दूसरी घटना 2001 में तमिलनाडु में देखने को मिली। तीसरी घटना 2 फरवरी, 2005 को गोवा में देखने को मिली। इस तरह यह कहा जा सकता है की भारत में दिन भारतीय राजनीति में घटती रहती हैं जिससे राज्यपाल की भूमिका विवादास्पद बन गई और लोग नाखुश हो गए हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्यपाल का पद बहुत ही गौरव और गरिमा का पद है। राज्यपाल को अनपे पद का मान हर हाल में बनाय रखना चाहिए। अपनी भूमिका का निर्वहन स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर करना चाहिए। विशेष परिस्थिति में उसे भी स्वविवेक की शक्तियाँ दी गई हैं, उसका इस्तेमाल जरूरत होने पर उचित रूप में अवश्य करना चाहिए न कि केंद्र के हाथों खिलौना बनाना चाहिए।

9. यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा है, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। बताएं कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं? संक्षेप में कारण भी दें-
  1. राज्य के विधान सभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया है और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
  2. फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफ़ा हो रहा है।
  3. प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
  4. केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु है।
  5. सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए है।
  6. दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया।
उत्तर-
  1. दिए गए प्रश्नों में 'i' के लिए राष्ट्रपति शासन संगत नहीं है। विपक्षी दलों की माँग अनुचित है।क्योकि इसके बदले दण्ड व्यवस्था होनी चाहिए।
  2. फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों का अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफ़ा को रोकने के लिए राष्ट्रपति शासन की आवश्यकता नहीं बल्कि अपराधियों को उचित सजा और कानून व्यवस्थ में सुधार की आवश्यकता है।
  3. प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करना असंगत है।
  4. केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं-यह स्थिति राष्ट्रपति शासन के योग्य नहीं है, क्योंकि संघात्मक शासन में द्विव्यवस्थापिका का प्रावधान है। वैसे यदि केंद्र में एक दल की सरकार है तो राज्य में दूसरे दल की सरकार हो सकती है।
  5. सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए-यह कथन सरकार की नाकामी की कहानी कहता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना न्यायसंगत होगा।
  6. दो प्रदेशों की बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया। इस स्थिति में राष्ट्रपति शासन उचित नहीं माना जायगा।

10. ज़्यादा स्वायत्तता की चाह में प्रदेशों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर- भारत में संघात्मक व्यवस्था का पालन किया जाता है और संघ तथा इकाइयों के अधिकार क्षेत्र संविधान द्वारा बँटे हैं, परन्तु केंद्र को ज्यादा शक्ति प्रदान की गई है। राज्यों ने अधिक स्वायत्तता की माँग 1960 के दशक से आरंभ की, जब कांग्रेस का वर्चस्व कम हुआ और विरोधी दल की सरकार बनीं। लेकिन यह सरकार ज़्यादा दिन कार्यरत नहीं रही चूँकि केंद्र सरकार ज़्यादा शक्तिशाली थी और वह किसी अन्य दल की सरकार को राज्य में सहन नहीं कर सकती थी। इसलिए केंद्र राज्य संबंधों पर पुनर्विचार और राज्यों की अधिक स्वायत्तता की माँग शुरू हुई।
राज्य की स्वयत्तता की माँग में मुख्य रूप से निम्नलिखित माँगे सम्मिलित हैं-
  1. संसद के द्वितीय सदन में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व हो।
  2. राज्य की शक्तियों पर केंद्र के हस्तक्षेप की व्यवस्था समाप्त की जाए।
  3. अवशिष्ट शक्तियाँ जो केंद्र में निहित हैं, वे राज्य के अधिकार क्षेत्र में भी आएँ।
  4. अनुच्छेद 356 को समाप्त किया जाए।
  5. राज्य विधान मंडल द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजने की व्यवस्था समाप्त हो।
  6. राज्य के आम स्रोतों में वृद्धि की जाए जिससे राज्य केंद्र की सहायता पर आश्रित न हो।

11. क्या कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए? क्या इससे दूसरे प्रदेशों में नाराजगी पैदा होती है? क्या इन विशेष प्रावधानों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकता मज़बूत करने में मदद मिलती है?
उत्तर- यदि कुछ प्रदेशो में शासन के प्रावधान विशिस्ट होंगे तो अन्य राज्यों में नाराजगी होना निश्चित है। इसका एक उदाहरण यह है-उत्तरांचल राज्य का दर्जा पाने से पूर्व उत्तर प्रदेश का भाग था और उत्तर प्रदेश के लोग जहाँ चाहे रह सकते थे। परंतु जब उत्तरांचल को विशेष दर्जा प्राप्त हो गया तो उत्तरांचल के बाहर के लोग वहाँ अचल संपत्ति नहीं खरीद सकते; जबकि उत्तरांचल के लोग उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ चाहे संपत्ति खरीद सकते हैं। स्थायी रूप से मूल निवासी का दर्जा उत्तरांचल अथवा अन्य किसी विशेष दर्जा प्राप्त अर्थात् विशेष प्रावधानों द्वारा शासित राज्यों में किसी बाहरी राज्य के व्यक्ति को नहीं मिल सकता। इस स्थिति में नाराजगी पैदा होती है। संविधान के अनुच्छेद 370 के लागू रहने के कारण जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है। भारतीय संसद वहाँ की व्यवस्थापिका की अनुमति के बिना उसमें कोई संशोधन नहीं कर सकती। शक्तियों के विभाजन की योजना के तहत संविधान प्रदत्त शक्तियाँ सभी राज्यों को समान रूप से प्राप्त हैं। परंतु कुछ राज्यों की ऐतिहासिक, सामाजिक तथा जनसंख्या संबंधी अवस्थाओं को देखते हुए विशेष प्रावधान किया गया है। मिजोरम, नागालैंड ,अरुणाचल प्रदेश, आदि राज्य ऐसे हैं जहाँ कुछ विशेष प्रावधान लागू हैं। संघीय व्यवस्था में शक्तियों का विभाजन संघ के सभी प्रांतों में समान रूप से होना चाहिए। लेकिन कुछ राज्यों के लिए कुछ विशेष प्रावधानों का होना भी आव्सय्क माना गया था।