डायरी का एक पन्ना - महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर 2

CBSE कक्षा 10 हिंदी 'ब' स्पर्श (गद्य खंड)
पाठ- 6 डायरी का एक पन्ना
महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

गद्य-पाठों के विषय-बोध पर आधारित प्रश्नोत्तर
  1. कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन क्यों महत्वपूर्ण था?
    उत्तर- 26 जनवरी, 1931 के दिन कलकत्ता के लोगों ने अंग्रेज़ी सरकार का डटकर विरोध किया और स्वतंत्रता दिवस मनाया। इसी कारण यह दिन कलकत्ता वासियों के लिए महत्त्वपूर्ण था।
  2. लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर किस बात का संकेत देना चाहते थे।
    उत्तर-
     लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर यह संकेत देना चाहते थे कि वे भारत को अंग्रेज़ी शासक से पूरी तरह मुक्त कराना चाहते हैं। अब वे अंग्रेज़ी साम्राज्य के गुलाम नहीं रहना चाहते। यह मुक्ति की ओर बढ़ता हुआ एक और कदम था।
  3. ‘आज जो बात थी वह निराली थी’ - किस बात से पता चल रहा था कि आज का दिन अपने आप में निराला है? स्पष्ट कीजिए।
    उत्तर-
     26 जनवरी, 1931 का दिन कलकत्ता वासियों के लिए महत्त्वपूर्ण दिन था। सभी लोगों ने इस दिन स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर ली थीं। स्त्री समाज अपनी तैयारी कर रहा था। लोगों की भीड़ सभा स्थल पर एकत्रित हो रही थी। लोग टोलियाँ बना-बनाकर मैदान में घूम रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। इसी कारण लेखक ने इस दिन को निराला कहा है।
  4. धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस क्यों टूट गया?
    उत्तर-
     धर्मतल्ले के मोड़ पर आते-आते जुलूस में भाग लेने वाले इतने आंदोलनकारी घायल हो गए कि जुलूस बिखर गया। कई स्त्रियों को पकड़कर पुलिस ने लालबाज़ार जेल भेज दिया। पुलिस ने लाठी चलाना नहीं छोड़ा और धीरे-धीरे जुलूस में लोगों की संख्या कुछ देर के लिए कम हो गई। इसी कारण धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस टूट गया था।
  5. विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
    उत्तर- विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। पुलिस ने उनके साथियों को मारा-पीटा तथा भागा दिया।
  6. 26 जनवरी, 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की गईं?
    उत्तर- 26 जनवरी, 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए कलकत्ता के बड़े बाज़ार के प्रायः सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया गया। उन्हें सजाया भी गया। प्रत्येक रास्ते पर झंडे लगाए गए। इससे लोगों में उत्साह का संचार हुआ। मोनुमेंट के नीचे शाम को झंडा फहराने एवं सभा का आयोजन किया गया। अनेक स्थानों से जुलूस निकालने का कार्यक्रम बनाया गया। मारवाड़ी बालिका विद्यालय में लड़कियों द्वारा झंडोत्सव मनाने की तैयारियाँ की गई।
  7. सुभाष बाबू के जुलूस में क्या हुआ?
    उत्तर-
     ठीक चार बजकर दस मिनट पर सुभाष बाबू जुलूस लेकर आए। उनको चौरंगी पर ही रोका गया, पर भीड़ की अधिकता के कारण पुलिस जुलूस को रोक नहीं सकी। मैदान के मोड़ पर पहुँचते ही पुलिस ने लाठियाँ चलानी शुरू कर दिन, बहुत आदमी घायल हुए, सुभाष बाबू पर भी लाठियाँ पड़ीं। सुभाष बाबू बहुत जोरों से वंदेमातरम् बोल रहे थे। ज्योतिर्मय गांगुली ने सुभाष बाबू से कहा, आप इधर आ जाइए। पर सुभाष बाबू ने कहा, आगे बढ़ना है। यह सब तो अपनी सुनी हुई लिख रहे हैं पर सुभाष बाबू का और अपना विशेष फासला नहीं था। सुभाष बाबू बड़े जोरों से वंदेमातरम् बोलते थे, यह अपनी आँख से देखा। पुलिस भयानक रूप से लाठियाँ चला रही थी। क्षितीश चटर्जी का फटा हुआ सिर देखकर तथा उसका बहता हुआ खून देखकर आँख मिंच जाती थी। इधर यह हालत हो रही थी कि उधर स्त्रियाँ मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़ झंडा फहरा रही थीं और घोषणा पढ़ रही थीं। स्त्रियाँ बहुत बड़ी संख्या में पहुँच गई थीं। प्रायः सबके पास झंडा था। जो वालेंटियर गए थे वे अपने स्थान से लाठियाँ पड़ने पर भी हटते नहीं थे। सुभाष बाबू को पकड़ लिया गया और गाड़ी में बैठाकर लाल बाज़ार लॉकअप में भेज दिया गया।
  8. ‘डायरी का एक पन्ना’ पाठ का संदेश क्या है?
    उत्तर-
     प्रस्तुत पाठ के लेखक सीताराम केसरिया आजादी की कामना करने वाले उन्हीं अनंत लोगों में से एक थे। वह दिन-प्रतिदिन जो भी देखते, सुनते और महसूस करते थे, उसे अपनी निजी डायरी में दर्ज़ कर लेते थे। यह क्रम कई वर्षों तक चला। इस पाठ में उनकी डायरी का 26 जनवरी, 1931 का लेखाजोखा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और स्वयं लेखक सहित कलकत्ता (कोलकाता) के लोगों ने देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस किस जोश-खरोश से मनाया, अंग्रेज़ प्रशासकों ने इसे उनका अपराध मानते हुए उन पर और विशेषकर महिला कार्यकर्ताओं पर कैसे-कैसे जुल्म ढाए, यही सब इस पाठ में वर्णित है। यह पाठ हमारे क्रांतिकारियों की कुर्बानियों की याद तो दिलाता ही है, साथ ही यह भी उजागर करता है कि एक संगठित समाज कृतसंकल्प हो तो ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके।